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एमपी में बनेगा 227 किमी लंबा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे, 70 किमी. कम होगी इन दो शहरों के बीच दूरी

Sagar Satna Expressway: प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के बनने से बुंदेलखंड और बघेलखंड के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी और 7-8 घंटे का सफर 4-5 घंटे में तय होगा।

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greenfield expressway

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Sagar Satna Green Field Expressway: मध्यप्रदेश में एक और हाई स्पीड ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे बनेगा जिस पर गाड़ियां सरपट दौड़ेंगी। बुंदेलखंड और बघेलखंड के बीच बनने वाले इस ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे से कनेक्टिविटी बेहतर होगी और सफर भी आसान होगा। सागर से सतना तक प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे को लेकर डीपीआर बनाने का काम जोरों पर है। डीपीआर बनने के बाद इसके लिए कैबिनेट से मंजूरी मिलेगी और बजट का आंवटन किया जाएगा।

70 किमी कम होगी सागर से सतना की दूरी

सागर से सतना की दूरी अभी करीब 300 किमी है और इस दूरी को तय करने में 7-8 घंटे का समय लगता है। नया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे बनने के बाद सागर से सतना की दूरी करीब 70 किमी कम होकर 227 किमी हो जाएगी। दूरी कम होगी तो सफर भी आसान होगा और सफर का समय भी 7-8 घंटे से घटकर 4-5 घंटे का हो जाएगा यानी समय की बचत तो होगी ही साथ ही ईंधन भी कम खर्च होगा।

सरकार ने दी मंजूरी

सागर से सतना तक बनने वाले 227 किमी लंबे ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के प्रोजेक्ट को मध्य प्रदेश सरकार ने मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट के निर्माण का जिम्मा मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम (MPRDC) को सौंपा गया है और वर्तमान में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने का काम चल रहा है। जैसे ही डीपीआर तैयार होगी उसके बाद काम में तेजी आएगी और जमीन पर काम नजर आने लगेगा। इस एक्सप्रेसवे के बनने से सीधे तौर पर सतना के सीमेंट व चूना पत्थर उद्योगों को फायदा होगा और सीमेंट व चूना पत्थर का ट्रांसपोर्टेशन सुगम होगा, जिससे क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी।

डीपीआर रिपोर्ट हो रही तैयार

प्रस्तावित सागर-सतना ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के लिए डीपीआर बनाने की प्रक्रिया जोरों पर हैं। डीपीआर रिपोर्ट में यह देखा जा रहा है कि कहां पर कितने मोड़ हैं, जिनको सीधा किया जा सकता है। इसके साथ ही कितने गांव सड़क बनाने में आ रहे हैं जिन्हें बाईपास किया जा सकता है। कहां जमीन अधिग्रहण की आवश्यकता होगी और कहां पर नदी पर पुल बनाने पड़ेंगे। कहां से रेलवे लाइन गुजर रही है, कहां पर ओवर ब्रिज, अंडर ब्रिज बनाने पड़ेंगे, कहां पहाड़ है कहां खेत है, किन इलाकों से होकर यह हाईवे गुजरेगा, इन तमाम चीजों का कहीं हवाई सर्वे से तो कहीं जमीन पर उतरकर तैयार किया जाता है।

ऐसा होता है ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस वे

  • ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे में बीच में मजबूत डिवाइडर बनाया जाता है, जिससे दोनों दिशाओं का ट्रैफिक पूरी तरह अलग रहता है।
  • सड़क के दोनों तरफ अलग-अलग टू-लेन मार्ग होते हैं, एक तरफ जाने और दूसरी तरफ आने वाले वाहन चलते हैं।
  • बड़े वाहनों के आमने-सामने आने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है, जिससे गंभीर सड़क दुर्घटनाओं का खतरा कम रहता है।
  • एक्सप्रेसवे के किनारे सीधे मकान, दुकान, होटल या रेस्टोरेंट के कट नहीं होते हैं।अचानक किसी वाहन, बाइक या व्यक्ति के सड़क पर आने की संभावना कम रहती है, जिससे सुरक्षा बढ़ती है।
  • एक्सप्रेसवे पर प्रवेश और निकास के लिए निर्धारित जंक्शन बनाए जाते हैं।
  • जंक्शन पर वाहन चालक पहले से सतर्क हो जाते हैं और सावधानीपूर्वक वाहन चलाते हैं।
  • नियंत्रित एंट्री और एग्जिट सिस्टम के कारण ट्रैफिक व्यवस्थित रहता है।
  • तेज गति के बावजूद दुर्घटनाओं की संभावना सामान्य हाईवे की तुलना में काफी कम होती है।
  • ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे लंबी दूरी की यात्रा को तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक बनाते हैं।