
सहारनपुर के एक अधिवक्ता ने आरक्षण पर पुनः सर्वे कराए जाने की मांग की है।
निकाय चुनाव से ठीक पहले आरक्षण को लेकर सवाल खड़ा हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता राजकुमार ने प्रमुख सचिव नगर विकास को पत्र लिखा है। कहा है कि वाराणसी और सहारनपुर महापौर सीट नियमनुसार इस बार अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व होनी चाहिए थी। उन्होंने कहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश में नगर निगमों में महापौर पद के लिए तय किए गए आरक्षण में नियमों का उल्लंघन हुआ है।
आगरा और झांसी के आरक्षण पर भी सवाल !
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और आरक्षण बचाओ समिति के अध्यक्ष राजकुमार ने नगर विकास सचिव को जो पत्र लिखा है कि इस बार आगरा और झांसी के नगर निगम के अध्यक्ष पद को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित करना नियम विरुद्ध है। ऐसा करके इन जिलों में सामान्य जाति और ओबीसी जाति के उम्मीदवारों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है। जो लोग चुनाव लड़ना चाहते थे वह चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इसी तरह से उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के भावी उम्मीदवारों के साथ भी गलत हुआ है।
घटते हुए क्रम से तय होना था आरक्षण
एडवोकेट राजकुमार का कहना है कि चक्र के अनुसार इस बार सबसे अधिक जनसंख्या वाले दो नगर निगम आरक्षित किए जाने थे। उनके बाद घटते हुए क्रम में नगर निगम के मेयर पद का आरक्षण तय होना था। इन नियमों को दरकिनाकर किया गया। ठीक इसी तरह से इस बार सहारनपुर और वाराणसी नगर निगम के महापौर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने थे लेकिन यहां भी नियमों का पालन नहीं हुआ।
अनुच्छेद 243 के तहत हो आरक्षण घोषित
राजकुमार ने प्रमुख सचिव से आग्रह किया है कि सभी नगर निगम के मेयर पद के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ ओबीसी आरक्षण पर पुनः विचार किया जाए। उन्हे पुनः व्यवस्थित किया जाए और संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत नगर पालिका और नगर निगम में जो नियम बनाए गए हैं उनके अनुसार ही आरक्षण की घोषणा की जाए। यानी उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि नगर निगम आगरा और झांसी की आरक्षित श्रेणी को समाप्त किया जाए और सहारनपुर में वाराणसी नगर निगम को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट घोषित किया जाए।
Published on:
11 Dec 2022 09:35 pm
