
4 से 6 लाख रुपए तक होती है पुंग्नूर नस्ल की गाय की कीमत, PC- Patrika
सहारनपुर : जहां ज्यादातर लोग महंगी कारों और लग्जरी सामानों की ओर आकर्षित होते हैं, वहीं सहारनपुर के पशु प्रेमी राजेंद्र अटल ने एक अनोखा रास्ता चुना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। पीएम मोदी को पुंगनूर गायों को दाना खिलाते देखकर राजेंद्र इतने प्रेरित हुए कि उन्होंने दुनिया की सबसे छोटी गायों में शुमार पुंगनूर नस्ल को पालने का फैसला कर लिया।
राजेंद्र अटल पहले से ही पशु-पक्षियों से गहरा लगाव रखते हैं। वे सहारनपुर में ‘प्रकृति कुंज’ नाम से एक आश्रय स्थल चलाते हैं, जहां विभिन्न जानवरों की देखभाल की जाती है। लेकिन पुंगनूर गाय देखने के बाद उनका जुनून नया मोड़ ले चुका है। उन्होंने मध्य प्रदेश से इस दुर्लभ नस्ल की गाय मंगवाई है और अब इसे स्थानीय स्तर पर विकसित करने का सपना देख रहे हैं, ताकि सहारनपुर इस अनोखी नस्ल का केंद्र बन सके।
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के पुंगनूर क्षेत्र से निकली यह नस्ल दुनिया की सबसे छोटी हंप वाली गायों में शामिल है। इसकी औसत ऊंचाई मात्र 70 से 90 सेंटीमीटर (लगभग 2.5 फीट) होती है, जबकि वजन 115 से 200 किलोग्राम के बीच रहता है। देखने में बेहद आकर्षक, शांत और मिलनसार यह गाय बच्चों और बड़ों दोनों को अपनी ओर खींच लेती है। छोटे कद के कारण इसे घर या छोटी जगह पर भी आसानी से पाला जा सकता है।
इस गाय की सबसे बड़ी खासियत इसका दूध है। हालांकि मात्रा कम (लगभग 3-5 लीटर प्रतिदिन) होती है, लेकिन गुणवत्ता अद्भुत है। इसमें 8 प्रतिशत तक फैट होता है, जो सामान्य गाय के दूध से काफी ज्यादा है। यह दूध A2 प्रकार का माना जाता है, जो पाचन के लिए बेहतर होता है और औषधीय गुणों से भरपूर है। बाजार में इस दूध की कीमत 600 से 1000 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है। यानी यह बादाम से भी महंगा बिक रहा है।
एक शुद्ध नस्ल की पुंगनूर गाय की कीमत 2 लाख से 5 लाख रुपये तक हो सकती है। राजेंद्र अटल ने भी करीब चार लाख रुपये खर्च करके यह गाय खरीदी है। पालन आसान नहीं है – सही देखभाल, आहार और नस्ल संरक्षण की जरूरत पड़ती है। फिर भी राजेंद्र का कहना है कि पशु प्रेम और पीएम मोदी से मिली प्रेरणा उन्हें इस चुनौती से पार पाने की ताकत दे रही है।
वे अब ब्रीडिंग (प्रजनन) पर काम कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि सहारनपुर में पुंगनूर गायों का एक छोटा फार्म विकसित हो, जहां इच्छुक किसान और पशु प्रेमी आसानी से इस नस्ल को प्राप्त कर सकें। इससे न सिर्फ दुर्लभ नस्ल का संरक्षण होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा होंगे।
Updated on:
20 Apr 2026 07:57 pm
Published on:
20 Apr 2026 07:54 pm
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