8 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

वाजपेयी का प्लेन नहीं उतरने दिया था MP के इस नेता ने, जानिए श्रीनिवास के 10 पॉलिटिकल किस्से

सियासी किस्सों में हमेशा जीवित रहेंगे मध्यप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी

5 min read
Google source verification

सतना

image

Rajiv Jain

Jan 21, 2018

Sriniwas tiwari

Sriniwas tiwari

शक्तिधर दुबे. सतना
कांग्रेस नेता दादा श्रीनिवास तिवारी अब नहीं हैं। लेकिन, उनके राजनैतिक किस्से हमेशा उनकी याद दिलाएंगे। ‘सफेद शेर’ के नाम से ख्यात रहे पूर्व विस अध्यक्ष श्रीनिवास से जुड़े लोग अनगिनत अनुभवों को कि स्सों के तौर पर सुनाते रहे हैं। विंध्य पुरुष श्रीनिवास बीते कुछ वर्षों से अस्वस्थता के चलते सियासत में हाशिए पर जरूर थे, पर उनकी मौजूदगी ही प्रदेशभर में समर्थकों की ऊर्जा थी। सच कहा जाए तो, प्रदेश विधानसभा में अध्यक्ष की भूमिका, सदन और सरकार पर नियंत्रण का पाठ उन्होंने ही पढ़ाया। दबंग आवाज के धनी ‘दादा’ की यादें सदन से लेकर रीवा शहर तक अविस्मृत होंगी।
गहन संसदीय ज्ञान, सदन पर पकड़, कानून की जानकारी और लंबे राजनैतिक अनुभव के कारण ही उन्हें विधान पुरुष माना गया। प्रतिद्वंद्वियों पर अंकुश रखने की कला में माहिर श्रीनिवास ने कभी आरोपों और आक्षेपों की परवाह नहीं की। जनहित, विंध्य हित और सत्ता की निरंकुशता के प्रति प्रतिकार को धर्म की तरह निभाया। बात चाहे स्वतंत्रता पूर्व की हो या अपनी चुनी हुई सरकारों के निर्णयों की। अविभाजित मप्र और उसके बाद भी उन्होंने पृथक विंध्य की वकालत की। वह यादगार दिन था जब विंध्य प्रदेश का विलयकर मप्र बनाया जाना था। और, उसकी पूर्व संध्या पर हुई बहस में सदन में लगातार ५ घंटे तक पृथक विंध्य प्रदेश के पक्ष में भाषण देकर सदस्यों को स्तब्ध कर दिया था। सदन मौन रहकर उनकी बात सुनता रहा। इसी तरह जमीदारी प्रथा के खिलाफ भी ७ घंटे भाषण दिया। कांग्रेस में उनकी राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता विंध्य के ही दूसरे दिग्गज नेता स्व. अर्जुन सिंह से बनी रही। लेकिन, दोनों नेता एक-दूसरे की विद्वता का सम्मान करते थे। हालांकि, दोनों पर जातिगत राजनीति को प्रश्रय देने का आरोप आजीवन लगता रहा। बावजूद, दोनों के कट्टर समर्थकों की बड़ी संख्या है। जो उनके न रहने पर भी केवल अपने नेताओं के नाम पर जुट जाते हैं। कांग्रेस के भीतर प्रदेशभर में श्रीनिवास और अर्जुन सिंह की राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता के अनगिनत किस्से आम हैं। बड़ी और सफेद भौंहों के लिए दादा और मंद मुस्कान के लिए पहचाने जाने वाले कुंवर ने अपनों को उपकृत करने के लिए नियमों की परवाह नहीं की। यही वजह है, जिसका भी भला किया वह उनका हो गया। समाजवाद के रास्ते कांग्रेस में आए श्रीनिवास ने समय-समय पर होने वाले मतभेदों के बाद भी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। लेकिन, असहमत होने पर अपनी बात भी पूरी ताकत और बेबाकी से रखी। और इन्हीं खूबियों के लिए श्रीनिवास कांग्रेस और प्रदेश में हमेशा याद किए जाएंगे।

अमहिया सरकार
श्रीनिवास अपनी कडक़ प्रशासनिक कार्यशैली और अडिग निर्णय शक्ति के लिए जाने जाते थे। भोपाल से रीवा आने पर अपने आवास में ही प्रदेश या क्षेत्र से जुड़े निर्णय या मंत्रणा करते थे। सत्ता और प्रशासन के लोग वहीं मौजूद रहते। आवास के बरामदे में तख्त पर बैठकर ‘दादा’ फाइलें देखते, लोगों की समस्याओं का समाधान करते। लापरवाही पर फटकार से लेकर अच्छे कामों के लिए सराहना तक वहीं होती। इसी वजह से लोग उन्हें अमहिया सरकार कहने लगे थे। सरकार के मंत्री तक किस्सागोई में कहते कि, मप्र में दो मुख्यमंत्री हैं। एक प्रदेश का दूसरा रीवा का। बावजूद, दादा का सम्मान सरकार, प्रशासन और जनता के बीच शीर्ष पर रहा।

बुलंद आवाज और व्यक्तित्व
दिवंगत बुजुर्ग नेता श्रीनिवास की दो खासियत हमेशा लोगों को आकॢषत करती रही। पहला भारी सफेद भौंहें, दूसरा बुलंद आवाज। ऐसे कई अवसर आए जब सार्वजनिक सभाओं या बैठकों में उनके भाषण के दौरान बिजली गुल हो गई। तक उन्होंने बिना इंतजार किए संबोधन जारी रखा। यह उनकी आवाज का ही कमाल था कि लोग बिना अवरोध भाषण सुनते और समझ भी जाते।

अटलजी को दी थी चुनौती
सन् 2003 के विस चुनाव में एक किस्सा आम हुआ था कि, विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए श्रीनिवास तिवारी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई का प्लेन उतरने नहीं दिया। दरअसल, मामला कुछ हटकर था। उन्होंने अटलजी को रीवा से चुनाव लडऩे की चुनौती दी थी। वजह थी कि, रीवा में अटलजी की सभा के दौरान किसी ने पर्ची में श्रीनिवास की शिकायत दी थी। तब अटलजी ने तंज कसा था कि, श्रीनिवास को सफेद शेर कहते हैं। और, उनसे भयभीत रहते हैं। वो किसी के काम नहीं होने देते।

IMAGE CREDIT: patrika

सरकार जाती थी विस अध्यक्ष के कक्ष में
जबतक श्रीनिवास विधानसभा अध्यक्ष रहे कभी अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी काम के लिए मुख्यमंत्री के कक्ष या बंगले में नहीं गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ही उनके पास मंत्रणा और निर्णय के लिए आते रहे। बतौर विस अध्यक्ष उन्होंने स्वयं मर्यादा का पालन किया और सरकार को भी मर्यादा में रखना सिखाया।

दादा न हो दऊ आय.....
सन् 1998 के चुनाव में एक जुमला प्रदेशभर में मशहूर हुआ। जो उनके समर्थकों ने ग्रामीण मतदाताओं के बीच से प्रचारित किया। मतदाता चुनाव में उनकी जीत के प्रति अत्यधिक आश्वस्त थे। उनका मानना था, दादा अजेय हैं। लिहाजा बघेली में जुमला चला ‘ दादा न हो दऊ आय, वोट न द्या तऊ आय’
तात्पर्य, दादा नहीं भगवान है, वोट दें या नहीं जीतेंगे वही। और, दादा सचमुच जीत गए। दूसरी बार विस अध्यक्ष बने।

समर्थकों के प्रति समर्पण
श्रीनिवास के अत्यंत करीबी लोगों के अनुसार, दादा हमेशा अपने समर्थकों के लिए किसी भी हद तक मदद करते थे। उनका कहना था कि, जो मेरा समर्थक है में उसका उससे बड़ा समर्थक हूं। शायद यही वजह है कि, उन्होंने देश और प्रदेश में अटूट समर्थकों की बड़ी श्रंखला तैयार की। वो रहें न रहे लोग उनके नाम पर ही हर बात मानने को तैयार रहते हैं।

स्वास्थ्य मंत्री रहते शिक्षा विभाग की फाइल में हस्ताक्षर
पहले चुनाव में विंध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष यादवेंद्र सिंह से लड़े। समर्थक मानते थे जीतते तो सीएम होते। जनहित में दुस्साहस के चलते स्वास्थ्य मंत्री रहने के दौरान उन्होंने शिक्षा विभाग की फाइल में हस्ताक्षर कर दिए। सवाल उठा तो बोले, कैबिनेट मंत्री की शपथ ली है। किसी एक विभाग की नहीं। मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह के खिलाफ कहा, वह भी मंत्री की तरह विधायक हैं। सब कुछ नहीं हो सकते।

IMAGE CREDIT: patrika

अर्जुन सिंह से मतभेद था, मनभेद नहीं
विंध्य से प्रदेश तक श्रीनिवास और अर्जुन सिंह की राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर थी। लेकिन, सच यह था कि दोनेां के बीच मतभेद था। मनभेद नहीं। यदाकदा दोनों नेताओं को एक मंच भी साथ साथ देखा गया है। फर्क कार्यशैली का था। विंध्य का विकास दोनों चाहते थे पर सोच और दिशा अलग थी। समर्थकों की मदद के मामले में दोनों ही नेताओं का नजरिया तकरीबन एक जैसा था।

मंत्री के अधूरे जवाब पर टोक देते थे
श्रीनिवास के कार्यकाल में सदन के सदस्य और मंत्रिमंडल में रहे लोगों का अनुभव भी किसी किस्से से कम नहीं। बताया, दादा सदन में हर विधायक और मंत्री की बात ध्यान से सुनते थे। अधूरे जवाबों को स्वयं पूरा कर देते। ऐसे में सदन भी ठीक चलता और मंत्री की भी मदद हो जाती।

IMAGE CREDIT: patrika

कांग्रेस में आए तो फिर कहीं नहीं गए
समाजवाद के रास्ते कांग्रेस में आने के बाद कई बार ऐसी परिस्थितियां बनीकि साथियों ने पार्अी बदलने की सलाह दी। पर, उन्होंने कहा यहीं रहकर सब ठीक करेंगे। कहीं नहीं जाना है। विरोधियों को जवाब देते रहे। हालातों से लड़ते रहे। यहां तक कि, 1985 में टिकट तक नहीं मिली पर उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी। अंतिम सांस भी कांग्रेस में रहते हुए ली।