सतना। आंगनबाडी केंद्र अब प्री-प्राइमरी स्कूल के रूप में संचालित होंगे। इसके लिए महिला बाल विकास विभाग कवायद शुरू कर दी है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अब 6 साल से कम उम्र के बच्चों को प्राइमरी शिक्षा देंगी। इसलिए आंगनबाड़ी केंद्रों अब प्ले स्कूल व नर्सरी स्कूल की तरह विकसित किया जाना है। इस दिशा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण की शुरुआत कर दी गई है। सबसे मजे की बात यह है कि यहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता नाच गाकर बच्चों को पढ़ाएंगी ताकि उन्हें आसानी से समझ आ सके।
कैसे सिखाएं बच्चों को दे रहे प्रशिक्षण
जिले में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को प्री स्कूल में पढ़ाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा है। इस योजना के तहत महिला बाल विकास विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग संयुक्त रूप से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें सभी को पांच दिवसीय गैर आवासीय प्रशिक्षण दिया जाना है। इसमें बच्चों को चित्र, कार्टून, कठपुतली के अलावा खेल-खेल में पढ़ाने के रोचक तरीके बताये जा रहे हैं। इस दौरान नाच गाकर किसी तरीके से बच्चों को पढ़ाया जाता है ताकि वे बेहतर तरीके से सीखें और समझे इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
ये है कॉन्सेप्ट
हम सभी जानते हैं कि बच्चों को स्कूल में लिखना और पढ़ना सिखाया जाता है। पर हममें से बहुत कम लोग जानते हैं कि लिखना और पढ़ना सीखने से पहले भी बच्चे के लिये कुछ और भी सीखना आवश्यक होता है और बच्चा इस सीखने की प्रक्रिया को अपने स्तर से पूरा करने का प्रथम प्रयास करता है घर की दीवारों पर उल्टी सीधी लाइने खींच कर बच्चे को इसी अवधि से एक ऐसे वातावरण की आवश्यकता होती है जहां उसे अपनी प्रतिभा को उभारने के समग्र तथा स्वतंत्र अवसर मिले। इन अवसरों की उपलब्धता को ही शाला पूर्व शिक्षा / स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम कहा जाता है।
बच्चे कर सकें प्रश्न
शाला पूर्व शिक्षा नर्सरी स्कूल या आंगनबाड़ी में बच्चों को सोचने समझने बोलने व सुनने के अवसर वार्तालाप, कहानी गीत कविता और खेलों के माध्यम से व करके सीखने के तथा स्वयं हल ढूंढने के अवसर आसपास के वातावरण को जानने तथा समझने के अवसर, पांचों इंद्रियों का इस्तेमाल करने के अवसर, स्मरण शक्ति का प्रयोग, बच्चों को प्रश्न करने के लिये प्रेरित करके उनके प्रश्नों के उत्तर धैर्यपूर्वक देकर छोटी बड़ी मांसपेशियों के विकास के अवसर बच्चों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के अवसर, बच्चों को पढ़ने लिखने व गणित के लिये तैयारी जैसे अक्षरों, आकृतियों की पहचान, नमूने बनाना, छापना, लाइन बनाना, लाइन मिलाना, आदि के माध्यम से शाला पूर्व शिक्षा देते हैं। इन क्रियाओं के माध्यम से बच्चे खेल-खेल में सीखते हैं जिससे उनके अंदर आत्म विश्वास का भाव जागृत होता है।
स्कूल रेडीनेस की तैयारी
अनौपचारिक शिक्षा से औपचारिक शिक्षा में प्रवेश की तैयारी को स्कूल रेडीनेस अर्थात् शाला जाने की तैयारी कहा जाता है। बच्चा अनौपचारिक से औपचारिक वातावरण में सहजता से प्रवेश कर सके इसके लिए उसे मानसिक रूप से तैयार किया जाना आवश्यक है। मानसिक रूप से तैयार बच्चे के अंदर आत्म विश्वास का भाव आ जाता है। अतः बच्चे को औपचारिक शिक्षा में प्रवेश के 6 माह पूर्व से ही औपचारिक शिक्षा की तैयारी करवाई जानी चाहिए। जो निम्नानुसार हो सकती हैं।