
corrupt Deputy director forced retired by MP Agriculture Department
सतना. वर्ष 2013-14 में जिले में हुए बहुचर्चित बीज अनुदान घोटाले में आरोपी बनाए गए तत्कालीन उप संचालक कृषि एसके शर्मा एवं तत्कालीन वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी उचेहरा गंगा सिंह को विभागीय जांच में वित्तीय अनियमितता का दोषी पाया गया है। आरोप प्रमाणित होने पर बुधवार (दो मई) को आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार ने तत्कालीन डीडीए शर्मा की सेवा समाप्त कर दी है। शर्मा वर्तमान में उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास कार्यालय दतिया में पदस्थ हैं। मामले के दूसरे आरोपी सेवानिवृत्त हो चुके एसएडीओ गंगा सिंह की पेंशन कटौती का प्रस्ताव तैयार कर अंतिम स्वीकृति के लिए मंत्री परिषद को भेजा गया है।
10 में एक आरोप प्रमाणित
बीज एवं अनुदान घोटाले में फंसे शर्मा एवं गंगा सिंह के विरुद्ध लोकायुक्त कार्यालय ने प्रकरण तैयार कर शासन को भेजा था। प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए दोनों आरोपियों के खिलाफ शासन ने विभागीय जांच प्रस्तावित की थी। केएस टेकाम अपर संचालक किसान कल्याण एवं विकास विभाग भोपाल को जांच अधिकारी तथा डीडीए रीवा को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किया गया था। लोकायुक्त द्वारा लगाए गए १० आरोपों में से विभागीय जांच में एक आरोप प्रमाणित पाया गया। आठ आरोप आंशिक रूप से प्रमाणित पाए गए। दोनों अधिकारी व्यक्तिगत सुनवाई में अपने बचाव में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। कृषि कल्याण एवं विकास विभाग द्वारा कराई गई जांच में डीडीए शर्मा पर कार्य में वित्तीय अनुशासन का पालन नहीं करने तथा वित्तीय अनियमितता के कदाचरण प्रमाणित हुए।
यह था मामला
तत्कालीन उप संचालक कृषि विभाग सतना एसके शर्मा एवं वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी उचेहरा गंगा सिंह द्वारा पदीय अवधि में जांच प्रतिवेदन अनुसार रबी वर्ष 2013-14 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन गेहूं अंतर्गत कृषकों के यहां आयोजित फसल प्रदर्शन, चना क्लस्टर, जिंक सल्फेट वितरण में अनियमितता की गई थी। शिकायतकर्ता की शिकायत पर एवं लोकायुक्त के आरोप पत्र के अनुसार विभागीय जांच में जांच अधिकारी ने उचेहरा विकासखंड के एक सैकड़ा कृषकों के लिखित बयान दर्ज किए थे। जांच में अनियमितता का आरोप प्रमाणित पाया गया। यह शिकायत ऊचहेरा के एक सामान्य किसान रामनारायण ने की। फसल प्रदर्शन अनुदान योजना के तहत किसानों को गेहूं, चना, मसूर के 10 से 20 किलो तक फ्री बीज देना था। अफसरों ने बीज बाजार में बेच दिए। रजिस्टर में फर्जी नाम लिख दिए गए। बहुत सारे इंद्राज तो ऐसे थे जो उस वक्त जीवित ही नहीं थे। तीन सौ किसानों ने शपथ पर देकर बीज अनुदान में घोटाले की शिकायत कर बताया कि उन्हें विभाग से बीज मिले ही नहीं, जबकि कागजों में उन्हें हितग्राही बताया गया था।
पांच साल में आया फैसला
जिले के बहुचर्चित बीज अनुदान घोटाले की विभागीय जांच पांच साल चली। इस दौरान भोपाल की जांच टीमें छह बार सतना पहुंचीं। कृषि कार्यालय से दस्तावेज जब्त किए। 200 से अधिक किसानों तथा एक दर्जन कर्मचारियों के बयान कलमबद्ध किए गए। प्रकरण में किसानों की संख्या अधिक होने के कारण जांच पूरी होने में चार साल का वक्त लगा।
Published on:
04 May 2018 03:00 pm
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