
Employee mindset giving jobs being checked by Facebook and Twitter
सतना. नौकरी देने वाली कंपनियां भले ही यह जानकारी नहीं देती हैं कि उनके चयन का आधार क्या होता है, लेकिन शहर के ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट अधिकारियों का कहना है कि बड़ी और कई छोटी कंपनियां अब युवाओं की मानसिकता जानने पर ज्यादा जोर दे रही हैं । यह कंपनियां सोशल मीडिया पर भेजे जाने वाले संदेश को बारीकी से देखने लगी है । अपने काम के क्षेत्र के अलावा इधर उधर की बातें, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विषयों पर व्यक्तिगत पोस्ट युवाओं को नौकरी दिलाने में रुकावट पैदा कर रही है। कंपनी एेसे ही एंप्लाई को जॉब देना चाहती है जिसका पहला फोकस कंपनी के लिए काम करना हो। यह भी देखती हैं कि जिस एंप्लाई को वे जॉब देने वाले हैं वह सोशल मीडिया में कितना समय बिता रहा है और किस तरह के विचारधाराओं के टच में हैं।
हर तरह की जानकारी जुटाती हैं कंपनियां
आईटी मैनेजमेंट और अन्य कंपनियां इंटरव्यू के समय युवाओं से पूछती हैं कि वह सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का उपयोग करते हैं । ज्यादातर का जवाब हां में होता है । इसको भले ही इंटरव्यू के दौरान कंटेस्टेंट हल्के में ले ले, लेकिन जानकारों का कहना है कि अच्छे एंप्लाई की तलाश में कंपनियां हर तरह की जानकारी जुटाने की कोशिश करती हैं । कई मामलों में ऐसा भी हुआ है कि फेसबूक पर लगातार अजीब पोस्ट डालने के चक्कर में युवाओं को नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा है।
इस तरह की जाती है मॉनिटरिंग
इंटरव्यू में पूछा जाता है कि आप सोशल नेटवर्किंक वेबसाइट का कितना उपयोग करते हैं। कंपनियां चाहती है कि उनके एंपलाई किसी विशेष विचारधारा से न बंधे हो। कई युवा राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर ही पोस्ट करते रहते हैं । कंपनियां कई युवाओं के प्रोफाइल पर जाकर उनकी पोस्ट से मानसिकता समझने की कोशिश करती हैं । जिस क्षेत्र में युवा काम करते हैं उससे संबंधित जानकारी नहीं होने और अन्य मुद्दों पर सोच थोपने की कोशिश करने वालों को कंपनी अलग नजरिए से देखती है।
प्रेजेंट ऑफ माइंड कितना
ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट अधिकारी का कहना है कि कई युवाओं का इंटरव्यू तो बेहतर रहता है लेकिन सामाजिक सोच महत्वपूर्ण रोल अदा करती है जो एंप्लॉई अपने क्षेत्र से ज्यादा राजनीतिक , धार्मिक विषयों पर अपने विचार सोशल मीडिया पर व्यक्त करते हैं उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है । कई एंप्लाई वाट्सएप पर हर पांच से 10 मिनट में ऑनलाइन होते हैं उन पर भी मॉनिटरिंग सिस्टम होता है जिसका नुकसान एंप्लाई को होता है।
कंपनी का नाम होता है खराब
कंपनिया सोशल मीडिया को चेक करने को लेकर कोई भी बयान ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट अधिकारियों को नहीं देती है, लेकिन यह संकेत दे दिया जाता है कि कॉलेज छात्रों को समझाएं कि वह अपना समय ऐसे विषयों में बर्बाद न करें जिसका उनके काम के क्षेत्र से मतलब नहीं है । कंपनियों का यह भी कहना होता है कि अगर उनका एंप्लॉई सोशल मीडिया पर कुछ भी अजीब पोस्ट या अपनी सोच थोपने की कोशिश करते हैं उसे उनकी कंपनी के नाम पर भी गलत प्रभाव पड़ता है।
-- कई युवाओं में जागरूकता की कमी है। वह बड़ी कंपनी में काम करने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन अपनी एक्टिविटीज को उस तरह का बना नहीं पाते हैं। बड़ी कंपनियां यह नहीं बताती कि उनके सिलेक्शन का आधार क्या क्या है कई मामलों में सोशल मीडिया से युवाओं की मानसिकता भी चेक की जाती है। जिसमें ज्यादातर युवा फेल साबित होते हैं।
डॉ. एमके पांडेय, ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट डायरेक्टर, एकेएस यूनिवर्सिटी सतना

Published on:
30 Aug 2018 02:11 pm
बड़ी खबरें
View Allसतना
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
