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संतान की लंबी उम्र के लिए महिलाएं रखती है हलछठ व्रत, ये है पूरी कथा

हलछठ व्रत: इस दिन बलराम का जन्म हुआ था और उनका मुख्य शस्त्र हल था इसलिए बोलते है हलषष्ठी

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सतना

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Suresh Mishra

Aug 31, 2018

Hal Chhath Vrat Katha halshashti vrat katha puja vidhi in hindi

Hal Chhath Vrat Katha halshashti vrat katha puja vidhi in hindi

सतना। संतान की दीर्घायु की कामना का पर्व हलषष्ठी शनिवार को धूमधाम से मनाया जाएगा। पर्व को लेकर बाजार में दिनभर पूजा-सामग्री की खरीदारी की। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को हलषष्ठी मनाई जाती है। इस दिन संतान की दीर्घायु के लिए महिलाएं व्रत रख कर पूजा-अर्चना करेंगी। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 1 सितम्बर को षष्ठी तिथि पड़ रही है। महिलाएं सुबह से व्रत रहकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकती हैं। स्नान-ध्यान के बाद व्रत, शाम को होगा।

ऐसे होगी पूजा-अर्चना
सुबह स्नान-ध्यान के बाद महिलाएं व्रत का संकल्प लेकर पूजा में जुट जाएंगी। आंगन में सांकेतिक तालाब बनाएंगी। उसमें झरबेरी, पलाश की टहनियों व कांस की डाल को बांधा जाएगा व फिर चना, गेहूं, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का व महुआ को बांस की टोकनी या फिर चुकड़ी में भरकर दूध-दही, गंगा जल अर्पित करते हुए षष्ठी देवी की पूजा की जाएगी। अंत में व्रत पारणा की जाएगी।

पसही के चावल की काफी डिमांड
बाजार में पूजन सामग्री सहित अन्य सामाग्री की खरीदी के लिए दुकानें सज गई हैं। गुरुवार को बाजार में पसही के चावल, भुजेना, महुआ, मिट्टी की डबुली की खरीदी करते महिलाएं नजर आईं। पं. अर्जुन ब्रह्मचारी के अनुसार इस दिन पुत्रवती स्त्रियां व्रत रखती हैं। इस दिन गाय का दूध, दही भी नहीं खाया जाता। भैंस का दूध दही ही उपयोग में लाया जाता है। इस दिन स्त्रियां एक महुए की दातुन करतीं हैं।

ये है व्रत का महत्व
भाद्र माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी या हरछठ व्रत रखा जाता है। यह व्रत वही स्त्रियां करती हैं जिनको पुत्र होता है। जिनको केवल पुत्री होती है, वह यह व्रत नहीं करती। यह व्रत पुत्र के दीर्घायु के लिए किया जाता है। इस व्रत में हल द्वारा जोता-बोया अन्न या कोई फल नहीं खाया जाता। क्योंकि इस तिथि को ही हलधर बलराम जी का जन्म हुआ था और बलराम जी का शस्त्र हल है।

इस व्रत में केवल भैंस के दूध, दही का उपयोग

इस व्रत में गाय का दूध, दही या घी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इस व्रत में केवल भैंस के दूध, दही का उपयोग किया जाता है। इस व्रत में महुआ के दातुन से दांत साफ किया जाता है। शाम के समय पूजा के लिए मालिन हरछ्ट बनाकर लाती है। हरछठ में झरबेरी, कास (कुश) और पलास तीनों की एक-एक डालियां एक साथ बंधी होती है। जमीन को लीपकर वहां पर चौक बनाया जाता है।