
बैंक में महिलाओं को लोन दिलाने आवश्यक कार्यवाही में जुटी कमला
सतना. कमला देवी... इनकी कुछ साल पहले तक पहचान बीड़ी मजदूर की थी। सतना से लगे करही कोठार में कुछ अन्य महिलाओं के साथ वो बीड़ी बनाने का काम करती थीं और हर सप्ताह होने वाले हिसाब में प्रति हजार बीड़ी के मान से बमुश्किल 30 रुपये हफ्ते कमा पाती थीं। इसी बीच उसे गांव की एक महिला से पता चला कि महिलाओं का समूह बना कर काफी कुछ कमाया जा सकता है। कमला ने उस महिला से कुछ समझा, कुछ अन्य लोगों से जानकारी ली और अपने साथ ही बीड़ी बनाने वाली महिलाओं काे साथ लिया और एक समूह बना कर बैंक में राशि जमा करने से शुरूआत की। आज यही कमला 'बैंक सखी' बन कर समूहों को ऋण दिलाती हैं। अब तक लगभग 600 महिलाओं को 95 लाख का ऋण दिला चुकी हैं और अपनी आमदनी से खुद के परिवार के भरण पोषण में अहम भूमिका निभा रही हैं।
ट्रेनिंग के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा
कमला ने बताया कि जब वह बीड़ी बनाने का काम करती थी तो उसे 30 से 40 रुपये हफ्ते की आय होती थी। इसके बाद साथी महिलाओं का समूह बना कर बैंक में राशि जमा करना शुरू किया। हर महिला 50 रुपये प्रति माह दुर्गा आजीविका स्व सहायता समूह के बैंक खाते में डालने लगे। लेकिन इस दौरान कोई बड़ा लाभ नहीं हुआ। तभी पता चला की आजीविका मिशन पढ़ी लिखी महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने के लिये ट्रेनिंग देता है। 10वीं पास थी। लिहाजा बैंक सखी के लिये फार्म भर दिया। आरसेटी में ट्रेनिंग हुई। इसके बाद समूह की महिलाओं को जोड़ने और उनका बैंक लिंकेज कराने लगी। बताया, अब लगभग 60 समूहों को 95 लाख रुपये का ऋण बैंकों से दिला चुकी हैं। जिसमें 600 महिलाएं जुडी हुई है। इतना ही नहीं अब कमला इन महिलाओं से बैंकों को ऋण वापसी में भी सहयोग करती हैं। उनके समूह के खाते में भी अब दो लाख लगभग आ चुके हैं। उनके अपने समूह की महिलाएं अब अपना अलग से स्वयं का व्यवसाय कर रही हैं। अब कोई महिला उनके समूह की बीड़ी का काम नहीं करती हैं। कमला अब बैंकों के लिये एक पहचान बन गई है तो कुछ लोग उन्हें लोन वाली दीदी के नाम से भी पुकारने लगे हैं।
जहां गुजारा मुश्किल था वहां अब 700 रुपये प्रतिदिन की कमाई
ऐसी ही कहानी फूलमती की है। अमरपाटन विकासखंड के ग्राम ताला में रहने वाली फूलमती कुशवाहा का परिवार काफी गरीबी में जीवन यापन करता था। कम जमीन और सिंचाई के साधन के अभाव में गुजारा बमुश्किल हो पाता था। फूलमती को तब लगा कि उसे घर की दहलीज से बाहर निकल कर कुछ काम करने की ठानी जिससे न केवल गांव घर में पहचान स्थापित हो बल्कि परिवार भी गरीबी से बाहर निकल सके। उन्होंने गांव में सिलाई कढ़ाई का काम शुरू किया लेकिन आय उतनी नहीं हो पा रही थी। तभी एनआरएलएम के लोगों के संपर्क में आईं और महिला स्व सहायता समूह की अवधारणा को समझा। हालांकि गांव की कई महिलाओं ने इसे समझा लेकिन अंगीकार नही कर सकी लेकिन फूलमती ने अपनी महिला साथियों के साथ मिल कर समूह बनाया। प्रशिक्षण प्राप्त किया और बैंक से 12 हजार रुपये लोन लिया। सभी महिलाओं ने मिलकर एक जनरल स्टोर से शुरुआत की। इसके परिणाम बेहतर आने शुरू हो गए और प्रतिदिन की आय 400 रुपये तक पहुंच गई। इसके बाद ७० हजार रुपये का ऋण लिया। इससे व्यवसाय बढ़ाते हुए रेडीमेड कपड़ों का भी कारोबार शुरू किया इसके साथ ही बुटीक का भी काम प्रारंभ कर दिया। अब इन सभी गतिविधियों से 700 रुपये प्रतिदिन की आय हो गई है। अब फूलमती न केवल अपने परिवार को मूल धारा में ला चुकी हैं बल्कि गांव की अन्य महिलाओं की भी आर्थिक स्थित मजबूत कर रही हैं।
Published on:
09 Mar 2022 11:10 am
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