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सोमालिया ही नहीं इंडिया में भी है कुपोषण के ऐसे हालात, फोटो देखकर रूह कांप जाएगी

चार माह की मासूम गंभीर कुपोषण का शिकार, चिह्नित भी नहीं कर पाया अमला

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सतना

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Suresh Mishra

May 05, 2018

10 departments to end malnutrition

10 departments to end malnutrition

सतना। गंभीर कुपोषण से पीडि़त 6 माह की मासूम अरैना का दुर्भाग्य यह है कि वह अपना कष्ट व्यक्त करने के लिए रोने का प्रयास करती है, लेकिन रो नहीं पाती। मुंह खोलती है पर सिसकी तक नहीं निकलती। उसके शरीर का हर जरूरी अंग जवाब दे चुके हैं। चमड़ी हड्डी से चिपक चुकी है। रगों में खून नहीं है। यह स्थिति देख डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है, मासूम के बचने की संभावना बहुत कम है। गंभीर कुपोषण से पीडि़त मासूम के मां-बाप भी लाचार हैं। अंतिम उम्मीद के साथ जिला अस्पताल के एनआरसी में मासूम भर्ती किए हुए हैं।

गणेश नगर वार्ड 14 सतना के रहने वाले

मासूम के पिता सुजीत कुमार गणेश नगर वार्ड 14 सतना के रहने वाले हैं। वे बताते हैं, नसबंदी ऑपरेशन फेल हो जाने के कारण अरैना का जन्म हुआ। जन्म से ही काफी कमजोर थी। कई जगह इलाज कराया, लेकिन बच्ची की सेहत में सुधार नहीं हुआ। स्थिति यह हुई कि कर्ज लेकर निजी चिकित्सकों के पास तक ले गया। पर, मासूम को कोई लाभ नहीं मिला। उसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। कुछ दिन पहले जिला अस्पताल लेकर आए, जहां एनआरसी में भर्ती किया गया।

जिला मुख्यालय का ऐसा हाल
छह माह की मासूम के पिता सुजीत कुमार निवासी गणेश नगर वार्ड क्रमांक-14 ने बताया कि यहां-वहां काम कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं। उसकी तीन संतान हैं। नसबंदी ऑपरेशन फेल होने के बाद अरैना का जन्म हुआ। वह जन्म से ही कमजोर थी। कर्ज लेकर बेटी का इलाज कराया लेकिन आराम नहीं मिला। अभी कर्ज चुकता भी नहीं कर पाए हैं। किसी भी विभाग से कोई मदद नहीं मिली। पोषक आहार भी बाजार से खरीद कर लाते थे।

रेफर किए बिना कह रहे ले जाओ
पीडि़त मासूम के पिता सुजीत ने कहा कि शुक्रवार को शिशु रोग विभाग के चिकित्सकों ने मासूम को देखा। कहा, बचने की उम्मीद नहीं है। हम रेफर नहीं करेंगे। किसी बड़े अस्पताल में ले जाकर इलाज कराओ। पूछने पर कारण भी नहीं बताया।

शरीर में पोषणतत्व नहीं
मासूम के शरीर में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट सहित अन्य पोषकतत्त्वों की कमी है। इनकी कमी से शारीरिक विकास भी थम गया है। कार्बोहाइड्रेट की कमी से लीवर कमजोर हो गया है। शरीर में पावर हाउस कहलाने वाला यह अंग नॉर्मल फंक्शन नहीं कर रहा है। इससे बॉडी को एनर्जी नहीं मिल पा रही है। मासूम को आधा दर्जन से अधिक बीमारियों ने घेर लिया है।

तंत्र पर बड़ा सवाल
हाल ही में प्रशासन ने जिले को कुपोषणमुक्त घोषित कर दिया है। वहीं तंत्र का आलम यह है कि मासूम का चिह्नाकन आज तक नहीं हो सका। जबकि, नियमों की बात करें तो आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी सहायिका सहित तमाम शासकीय व निजी स्वास्थ केंद्रों को जिम्मेदारी दी गई है कि ऐसे बच्चों को चिह्नित कर एनआरसी पहुंचाएं। इसके लिए आशा, ऊषा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को प्रेरक राशि भी दी जाती है। स्वास्थ्य विभाग व महिला बाल विकास विभाग की सभी कवायदें असफल नजर आती हैं। जबकि, मासूम जिला मुख्यालय की है।

दवा नहीं दे रही राहत
शरीर ने बीमारी से लडऩे की क्षमता खो दी है। लिहाजा, दवाइयों का असर तक मासूम पर नहीं हो पा रहा है। उसकी रोने की आवाज इतनी कम है कि गोद में लिए मां भी नहीं सुन पाती।

मासूम गंभीर कुपोषण का शिकार है। एनआरसी में बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराई जा रही है। माता-पिता को परामर्श भी दिया गया है।
डॉ. एसके पाण्डेय, शिशु रोग विशेषज्ञ

पीडि़त मासूम को जिला अस्पताल में ही बेहतर चिकित्सा मुहैया कराई जाएगी। मासूम का चिह्नांकन क्यों नहीं हुआ जांच कराएंगे।
मुकेश शुक्ला, कलेक्टर

कुपोषित मासूम का चिह्नांकन क्यों नहीं किया गया? किस स्तर पर लापरवाही बरती गई? इसकी जांच करायी जाएगी। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मनीष सेठ, जिला महिला बाल विकास अधिकारी