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मां शारदा मंदिर के ये 9 रहस्य आज भी बरकरार, सुनिए मुख्य पुजारी देवी प्रसाद की जुबानी

मैहर मंदिर के महंत पंडित देवी प्रसाद बताते हैं, अभी भी मां का पहला श्रृंगार आल्हा ही करते हैं। जब ब्रह्म मुहूर्त में शारदा मंदिर के पट खोले जाते हैं,

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सतना।शक्ति की साधना, आराधना और सृजन का पर्व गुरुवार से शुरू हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले आस्था के इस संगम में देशभर से लाखों की संख्या में भक्त 'डुबकीÓ लगाएंगे। नवरात्र की पूर्व संध्या से ही भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। घंटाघर, रेलवे स्टेशन, रीवा रोड से हजारों दर्शनार्थी मंदिर की ओर जाते देखे जा गए। पुलिस-प्रशासन ने यहां लगने वाले मेले की तैयारी पूरी कर ली है।

पहली बार मेला परिक्षेत्र में क्राइम ब्रांच के अफसर भी तैनात होंगे। मंदिर परिसर स्थित प्रसाद दुकानदारों, ऑटो चालकों सहित अन्य लोगों को दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं, ताकि भक्तों को किसी प्रकार की समस्या न हो। यहां MP.PATRIKA.COM मां शारदा मंदिर के 9 ऐसे रहस्य बता रही है जो आज भी बर्करार है।

1. प्रथम पूज्य आल्हा-ऊदल
मैहर मंदिर के महंत पंडित देवी प्रसाद बताते हैं, अभी भी मां का पहला श्रृंगार आल्हा ही करते हैं। जब ब्रह्म मुहूर्त में शारदा मंदिर के पट खोले जाते हैं, तो पूजा की हुई मिलती है। इस रहस्य को सुलझाने का प्रयास भी कई बार किया गया, लेकिन रहस्य बरकरार है। माता के सबसे बड़े भक्तों में आल्हा और ऊदल का नाम आता है। ये दोनों वो महारथी हैं, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था। इन दोनों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच मैहर मंदिर की खोज की थी।


2. ६०० फीट की ऊंचाई पर माता का मंदिर
त्रिकूट पर्वत की चोटी के मध्य में शारदा माता का मंदिर है। यह मंदिर भू-तल से ६०० फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस ऊंचाई को सीढ़ी या रोप-वे से पार कर भक्त मां का दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर तक जाने वाले मार्ग में ३०० फीट तक की यात्रा गाड़ी से भी की जा सकती है।


3. १०६३ सीढिय़ों के पार माता
मां शारदा तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढिय़ां पार करनी होती हैं। यात्रा को चार खंड में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम खंड की यात्रा में ४८० सीढिय़ों को पार करना होता है। द्वितीय खंड 228 सीढिय़ों का है। इस यात्रा खंड में पानी व अन्य पेय पदार्थों का प्रबंध है। यहां पर आदिश्वरी माई का प्राचीन मंदिर है। यात्रा के तृतीय खंड में १४७ सीढिय़ां हैं। चौथे और अंतिम खंड में 196 सीढिय़ां पार करनी होती हैं।


4. माता के साथ अन्य देवी-देवता की पूजा
पूरे भारत में सतना का मैहर मंदिर माता शारदा का अकेला मंदिर है। इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरवी, भगवान हनुमान , देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी-शंकर, शेष नाग, फूलमति माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी की भी पूजा की जाती है।


5. मंदिर की स्थापना
मां शारदा की मूर्ति के चरण के नीचे अंकित एक प्राचीन शिलालेख है। जो मूर्ति की प्राचीन प्रमाणिकता की पुष्टि करता है। मैहर के पश्चिम दिशा में त्रिकूट पर्वत पर शारदा देवी व उनके बायीं ओर प्रतिष्ठापित श्रीनरसिंह भगवान की पाषाणमूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा है। बताया जाता है कि लगभग २००० वर्ष पूर्व विक्रमी संवत् 559 शक 424 चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, दिन मंगलवार, ईसवी सन् 502 में स्थापित कराई गई थी। मां शारदा की स्थापना तोरमान हूण के शासन काल में राजा नुपुल देव ने कराई थी।


6. बलि प्रतिबंधित
मंदिर में बलि देने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही थी। जिसे 1922 ई. में जैन दर्शनार्थियों की प्रेरणा से सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। उसके बाद से बलि प्रथा धीरे-धीरे बंद हो गई।


7. जहां मां का हार गिरा वो है मैहर
हिन्दू श्रद्धालुजन देवी को मां अथवा माई के रूप में परंपरा से संबोधित करते चले आ रहे हैं। माई का घर होने के कारण पहले माई घर कहा गया। इसके बाद इस नगर को मैहर के नाम से संबोधित किया जाने लगा। एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान शंकर के तांडव नृत्य के दौरान उनके कंधे पर रखे माता सती के शव से गले का हार त्रिकूट पर्वत के शिखर पर आ गिरा। इसी वजह से यह स्थान शक्तिपीठ तथा नाम माई का हार के आधार पर मैहर के रूप में विकसित हुआ।


8. कई रहस्य आज भी बरकरार
ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस तथ्य का प्रमाण प्राप्त होता है कि इतिहासविद् ए. कनिघम द्वारा मां शारदा मंदिर का काफी अध्ययन किया गया है। मैहर के पंडित मोहनलाल द्विवेदी शिलालेख के हवाले से बताते हैं कि कनिघम के प्रतीत होने वाले 9वीं व 10वीं सदी के शिलालेख की लिपि न पढ़े जाने के कारण अभी भी रहस्य बने हुए हैं।


9. चौतरफा हैं प्राचीन धरोहरें
मैहर केवल शारदा मंदिर के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि इसके चारों ओर प्राचीन धरोहरें बिखरी पड़ी हैं। मंदिर के ठीक पीछे इतिहास के दो प्रसिद्ध योद्धाओं व देवी भक्त आल्हा-ऊदल के अखाड़े हैं। यहीं एक तालाब और भव्य मंदिर है, जिसमें अमरत्व का वरदान प्राप्त आल्हा की तलवार उन्ही की विशाल प्रतिमा के हाथ में थमाई गई है।