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दुनिया भर में प्रसिद्ध है बंदूक की नली से बना नल तरंग, इंदिरा गांधी से लेकर पृथ्वीराज तक थे बाबा के फैन

ये है मैहर वाद्य वृंद बैंड की खासियत, 25 नवंबर से चल रहा मैहर वाद्यवृंद बैंडÓ का शताब्दी वर्ष समारोह

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सतना

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Suresh Mishra

Nov 26, 2017

Maihar Vadya Vrinda story of Ustad Allauddin Khan

Maihar Vadya Vrinda story of Ustad Allauddin Khan

सतना। संगीत सम्राट उस्ताद अलाउद्दीन खां द्वारा स्थापित 'मैहर वाद्यवृंद बैंडÓ का शताब्दी वर्ष 25 नवंबर से मनाया जा रहा है। जिसका समापन 26 नवंबर को मैहर बैंड की प्रस्तुतियों के साथ होगा। मैहर बैंड के द्वितीय पंक्ति के वरिष्ठ संगीतकार रामलखन पांडे ने बताया कि बाबा के वाद्यवृंद बैंड से राजनेता व अभिनेता तक प्रभावित थे। सन 1962 में पचमढ़ी में बाबा के कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बेहद प्रभावित हुईं।

1964 में मुंबई से मैहर आए प्रसिद्ध अभिनेता

उन्होंने कलाकारों से मुलाकात कर नल तरंग की जानकारी ली थी। वहीं सन् 1964 में मुंबई से मैहर आए प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने बाबा की संगीत साधना और क्षमता को दंडवत कर प्रणाम किया। बाबा को संगीत के क्षेत्र में उपलब्धियों के लिए संगीत सम्राट, पद्म भूषण, पद्म विभूषण अलंकरणों से नवाजा जा चुका है। वाद्य वृंद बैंड की बुनियाद भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा, संगीत अन्वेषक सम्राट उस्ताद अलाउद्दीन खां ने 1918 में रखी थी।

20 संगीत विधा में पारंगत

जानकारों के अनुसार, सन् 1917 में मैहर के तत्कालीन राजा बृजनाथ सिंह ने आदेश दिया कि कहीं भी बाहर निकलने पर उन्हें गाना सुनाई देना चाहिए। शहर व आसपास डुगडुगी पिटवाकर 150 लड़के इकट्ठा किए गए। इन्हीं अनाथ बच्चों को इकट्ठा कर बाबा ने बैंड पार्टी तैयार की। 20 संगीत विधा में पारंगत हुए। बाबा के बनाए 200 रागों व बंदिशों में बमुश्किल बीस-पचीस रागों की जानकारी वर्तमान बैंड कलाकारों को है।

शुरुआती कलाकार
मैहर बैंड में 18 वाद्य यंत्र एकसाथ बजाए जाते थे। एक साथ निकलने वाली धुन श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी। लेकिन बाबा का प्रिय वाद्ययंत्र सरोद नहीं बजाया जाता था। बैंड की प्रथम पंक्ति के कलाकारों में विश्वनाथ (वायलिन) अनार खां, महिपत सिंह (सितार), शिवसहाय (बांसुरी), रामस्वरूप (सितार-बैंजो), बैजनाथ सिंह (बांसुरी), तंसू महाराज, जमुना प्रसाद उर्फ गुलगुल (हारमोनियम), वृंदा माली, मूलचंद, चुनबादी, दशरथ माली (इसराज), झुर्रेलाल (नलतरंग), गिरधर लाल (नल तरंग-पियानो), लच्छी कोरी (तबला ढोलक), सुखदेव सारंगा, उर्मिला प्रसाद (चेलो), महिपत सिंह (सितार), चुनबद्दी, लालमन (तबला), शिवनाथ (क्लानेट) शामिल थे।

बंदूक की नली से बनाया नल तरंग
बाबा ने कई स्वनिर्मित राग बनाए। कुछ राग आज भी बजाए जाते हैं। रागों के अलावा वाद्य यंत्र भी बनाए। इसमें बंदूक की नली से बना 'नल तरंग' विश्व प्रसिद्ध है। इसे आज भी मैहर बैंड में बजाया जाता है। जो पूरी दुनिया में मशहूर हुई। उन्होंने वाद्य वृंद को 278 कंपोजिशन्स दिए। जिसमें इंडियन-वेस्टर्न कल्चर का शास्त्रीय मिश्रण था। आज मात्र 36 कंपोजिशन्स बचे हैं।

जल तरंग की तर्ज पर बना नल तरंग
मैहर वाद्य वृंद 1930 के दशक में महामारी के पीडि़तों की मदद के लिए अलाउद्दीन खां ने मैहर बैंड की स्थापना की थी। अज्ञात बीमारी से जूझ रहे असहाय और लावारिसों को लेकर टोली बनाई। उन्हें शास्त्रीय संगीत की तालीम दी। उस्ताद के नाती और सरोद वादक राजेश अली खां के अनुसार, असहाय लोगों को बैंड से जोड़ते हुए 18 संगीतकारों की टीम खड़ी की। टीम देशभर में प्रस्तुति देती रही है। अलाउद्दीन खां ने जल तरंग की तर्ज पर दुर्लभ बंदूक की नली से नल तरंग का अविष्कार किया।

26 नवंबर की प्रस्तुतियां
- राजेंद्र प्रसन्ना शहनाई वादन नई दिल्ली।
- सुभेंद्र राव सितार वादन नई दिल्ली।
- भुवनेस कोकलली का गायन देवास।