
MP Vidhan Sabha Election 2023: विधानसभा चुनाव में इस बार पार्टियों की नजर आधी आबादी के वोट बैंक पर है। 33 फीसदी सीटों पर महिला आरक्षण बिल लाकर भाजपा ने महिला मतदाताओं को साधने का बड़ा दांव खेला तो कांग्रेस ने भी रणनीति तैयार कर ली है। पर, चुनावी संग्राम में आधी आबादी की भागीदारी की बात की जाए तो विंध्य की सियासत में महिलाएं हाशिए पर रही हैं। भाजपा हो या कांग्रेस, विस चुनाव में किसी भी दल ने उनको उतनी तवज्जो नहीं दी, जितनी मिलनी चाहिए। विंध्य के चुनावी इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो यहां की 25 सीटों में से महज 13 महिला विधायक ही चुनावी रण भेद सकीं हैं। सबसे अधिक 7 महिला विधायक रीवा की हैं। जबकि सतना से 3, सिंगरौली से एक, पन्ना से एक और सीधी से अब तक सिर्फ जगवा देवी ही जीत पाईं हैं।
अब तक 55 महिलाओं ने लड़ा चुनाव, महज 3 विधायक बनीं
अब तक ये महिलाएं पहुंचीं विधानसभा
जिले में अब तक की सबसे सफल महिला नेत्री चंपादेवी रहीं, जो तीन बार विधानसभा का सदस्य चुनी गईं। पहली बार 1957 में सिरमौर सीट से यमुना प्रसाद शास्त्री जैसे दिग्गज को हराकर महिला नेतृत्व का डंका बजाया। 1980 और 1985 में वह मनगवां सीट से विधायक बनीं। 1998 में गुढ़ से बसपा की विद्यावती ने जीत हासिल की। मनगवां सीट से भाजपा की पन्नाबाई 2008 में एवं बसपा से शीला त्यागी 2013 में विधायक बनीं। 2013 में ही भाजपा की नीलम मिश्रा सेमरिया से जीतकर विधानसभा पहुंचीं।
सतना। राजनीति के रण में महिलाओं को ज्यादा वरीयता नहीं मिली है। अगर 1957 से 2018 तक के चुनावों को देखें तो मैदान में कुल 55 महिलाएं ही लड़ाई लड़ी हैं। इसमें से 20 को राजनीतिक दलों ने टिकट देकर मैदान में उतारा तो 35 निर्दलीय सामने आईं। सबसे पहले कांग्रेस ने महिला पर भरोसा जताते हुए 1967 में कांता बेन पारेख को सतना सीट से टिकट दिया था। 18861 वोट पाकर वे विधायक भी बनीं। कांता बेन 1972 के चुनाव में भी 31896 वोट पाकर कांग्रेस से विधायक बनीं। सबसे ज्यादा 13 महिला उम्मीदवार 2013 के चुनाव में देखने को मिलीं।
संपतिया पहली निर्दलीय उम्मीदवार: 1980 के चुनाव में सतना विधानसभा से पहली बार किसी निर्दलीय महिला उम्मीदवार ने राजनीति के मैदान में कदम रखा। वह थीं संपतिया। उन्होंने 178 वोट पाए। 1985 में हरछठिया ने निर्दलीय उम्मीदवारी के जरिए रैगांव से उम्मीदवारी जताई। 200 वोट मिले। 1990 में सतना से यशोदा देवी ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर 374 वोट और चित्रकूट से सोराज ने निर्दलीय के तौर पर 333 वोट पाए। 1993 में भी पार्टियों ने महिला उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं जताया। चित्रकूट से दयावती निर्दलीय लड़ीं और 216 वोट पाईं। रामपुर बाघेलान से सरस्वती निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर 183 मत पाने में सफल रहीं। 1998 में भी दो महिला उम्मीदवार मैदान में नजर आईं। रैगांव से जनता दल के टिकट पर मीना ने 905 मत प्राप्त किए। रामपुर बाघेलान से एबीएमएसडी से मीरा लड़ी और 222 वोट पाने में सफल रहीं।
रीवा। राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए महिलाओं को अपेक्षा के अनुरूप पार्टियों से टिकट नहीं मिला। अब तक दलों ने आठों सीट पर 100 से ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया, जीत महज पांच ही सकीं। आधी आबादी को टिकट देने में कांग्रेस सबसे आगे रही। 1957 में सबसे पहले चंपादेवी को सिरमौर से टिकट दिया और सफलता प्राप्त की। मंजूलता तिवारी मऊगंज, साधना कुशवाहा गुढ़, अरूणा तिवारी को सिरमौर से टिकट दिया। ये नहीं जीत सकीं। भाजपा ने संतोष सिंह सिसोदिया को मऊगंज एवं सुधा सिंह को सिरमौर से टिकट दिया। ये भी चुनाव हार गईं। भाजपा से सेमरिया से नीलम मिश्रा और मनगवां से पन्नाबाई ही जीत सकीं। विद्यावती पटेल ने बसपा से गुढ़ से बाजी मारी।
2003 महिलाओं के लिए बेहतर रहा। अब तक के चुनावों में सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवार न केवल चुनाव मैदान में रहीं बल्कि पार्टियों ने भी भरोसा जताया। मैहर विधानसभा से कांग्रेस ने प्रतिभा पटेल को टिकट दिया और उन्हें 23010 वोट मिले। भाजपा से यशोदा मिश्रा चुनाव उतरीं और उन्हें 14489 वोट मिले। नागौद से बसपा ने सावित्री कुशवाहा को टिकट दिया। उन्हें 10285 वोट मिले। रैगांव से बसपा ने ऊषा चौधरी को मैदान में उतारा और उन्होंने 21401 वोट हासिल किए। यहां से रानी देवी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरीं और 5217 वोट पाए। चित्रकूट से ऊषा सिंह गोंगपा से 2194 वोट पाने में सफल रहीं। यहीं से मुन्नी क्रांति निर्दलीय 1410 वोट, प्रतिमा सिंह एलजेेएनएसपी से 1071 वोट पाने में सफल रहीं। सतना विधानसभा से माया निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 1287 वोट, रब्बी खान को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 922 वोट मिले। रामपुर बाघेलान से कांग्रेस ने संगीता सिंह को टिकट दिया और उन्हें 14415 वोट मिले।
इन सीटों पर नेतृत्व का मौका नहीं
जिले की रीवा, देवतालाब, मऊगंज एवं त्योंथर विधानसभा सीट से कभी भी महिलाएं विधायक नहीं बनीं। कई बार भाजपा, कांग्रेस एवं अन्य दलों की ओर से टिकट भी महिलाओं को दिए गए, लेकिन उसे जीत में बदलने में सफल नहीं हो पाए। प्राइम सीट रीवा ऐसी है जहां से भाजपा एवं कांग्रेस ने कभी महिलाओं को मौका नहीं दिया। केवल सीपीएम ने 1998 में लीला मिश्रा को उतारा था, लेकिन वह सफल नहीं हो सकीं।
ये भी हारीं... कांग्रेस से देवतालाब में हार का सामना करना पड़ा। गुढ़ से भाजपा की अंजू मिश्रा, देवतालाब से बसपा की सीमा जयबीर सिंह एवं त्योंथर से बसवा की गीता मांझी चुनाव हार चुकी हैं।
2013 और 2018 में लहराया परचम
हमारी पार्टी बिना आरक्षण के ही जो महिलाएं सक्षम हैं, सक्रिय हैं और जीत सकती हैं उनको टिकट दे रही है। जिले में पहले भी टिकट दिया है और महिलाएं जीती भी हैं। पार्टी सर्वे कराती है और समीकरण भी देखना होता है। हमारे आठों विधायक जीते थे, उनको टिकट देना उचित है। मैंने काम किया है, लेकिन सिटिंग एमएलए का पहला हक है। पार्टी उचित निर्णय करती है।
- संतोष सिंह सिसोदिया, जिलाध्यक्ष भाजपा
कांग्रेस ने हमेशा महिलाओं के साथ ही सभी वर्गों को उनके अनुपात एवं समीकरण के हिसाब से मौका दिया है। जिले में सबसे पहले कांग्रेस ने ही महिला उम्मीदवार चंपादेवी को उतारा था और उनको जीत भी मिली थी। पिछले विधानसभा चुनाव में तीन महिलाओं को टिकट दिया था। उम्मीद है कि इस चुनाव में भी महिलाओं की भागीदारी ठीक रहेगी।
- सीमा सिंह, जिलाध्यक्ष ग्रामीण कांग्रेस
2013 में 10 और 2018 में 12 महिलाएं चुनाव मैदान में उतरीं। दोनों चुनावों में एक-एक महिला विधायक बनने में सफल रहीं। 2013 में रैगांव से बसपा उम्मीदवार ऊषा चौधरी 42610 वोट के साथ विधायक निर्वाचित हुईं तो 2018 मध्यावधि में कल्पना वर्मा कांग्रेस के टिकट पर 48489 वोट के साथ विधायक निर्वाचित हुईं। 2013 के चुनावों की स्थिति देखें तो चित्रकूट से लीलावती यादव एनसीपी 2220 वोट, रैगांव से सुखवंती कोरी सपा से 1460 वोट, सतना से मीना मल्लाह निर्दलीय 583, मुन्नी क्रांति निर्दलीय 417, उर्मिला कोल एनपीईपी 168, निर्मला चौधरी आरएसएमडी 137 वोट पाने में सफल हुईं।
Updated on:
14 Oct 2023 03:32 pm
Published on:
14 Oct 2023 03:30 pm
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