एक भारतीय समाजसेवी से राजनेता बने नानी जी ने दीनदयाल उपाध्याय द्वारा ग्रामोदय भारत की परिकल्पना को साकार किया।
सतना। महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में जन्मे चंडिकादास अमृतराव देशमुख ने एक छोटे से गांव से निकलकर भगवान राम की कर्मस्थिली चित्रकूट तक सफर किया। बताया जाता है कि कडोली नामक छोटे से कस्बे में ब्राह्मण परिवार में 11 अक्टूबर सन् 1916 को जन्म लेने वाले नानाजी का बचपन संघर्षों में बीता। छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया।
मामा ने उनका लालन-पालन किया। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने तक के लिए पैसे नहीं थे लेकिन उनके अंदर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कृष्ट अभिलाषा थी। इस कार्य के लिए उन्होंने सब्जी बेंचकर पैसे जुटाए। वे मंदिरों में रहे और पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की।
ग्रामोदय की परिकल्पना की साकार
एक भारतीय समाजसेवी से राजनेता बने नानी जी ने दीनदयाल उपाध्याय द्वारा ग्रामोदय भारत की परिकल्पना को साकार किया। वे पूर्व में भारतीय जनसंघ के नेता भी रहे। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो उन्हें मोरारजी-मंत्रिमंडल में शामिल किया गया लेकिन उन्होंने यह कहकर कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग सरकार से बाहर रहकर समाज सेवा का कार्य करें, यह कहकर मंत्री-पद ठुकरा दिया था। अटलजी की सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। अटलजी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालंबन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिए पद्म विभूषण भी प्रदान किया।
बाल गंगाधर तिलक प्रेरणास्त्रोत
नानाजी बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित हुए। तिलक से प्रेरित होकर उन्होंने समाजसेवा में रुचि ली। आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से उनके पारिवारिक संबंध थे। 1940 में डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद नानाजी ने कई युवकों को महाराष्ट्र की आरएसएस शाखाओं में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फिर भी भूमिगत होकर कार्य जारी रहा।
कलाम ने की थी नानाजी की प्रशंसा
तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी और उनके संगठन दीनदयाल शोध संस्थान की प्रशंसा की। इस संस्थान की मदद से सैकड़ों गांवों को मुकदमा मुक्त विवाद सुलझाने का आदर्श बनाया गया। कलाम ने कहा-"चित्रकूट में मैंने नानाजी और उनके साथियों से मुलाकात की। दीनदयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है।
देहदान का कराया वसीयतनामा
नानाजी ने 95 साल की उम्र में चित्रकूट स्थित भारत के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय में रहते हुए अंतिम सांस ली। नानाजी देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपना शरीर छात्रों के मेडिकल शोध के लिए दान करने का वसीयतनामा मरने से काफी समय पूर्व 1997 में ही लिखकर दे दिया था, जिसका सम्मान करते हुए उनका शव अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली को सौंप दिया गया।