
Police refuse to register FIR in 50-lakh cooperative scam
सतना. घोटालों के मामले में कार्रवाई को लेकर बदनाम रही सतना पुलिस पर एक और दाग लगा है। मामला सिंहपुर थाने से जुड़ा सामने आया है। थाना प्रभारी ने गबन के मामले में यह कहते हुए एफआइआर दर्ज करने से मना कर दिया कि यह राशि वसूली योग्य है। इसलिए आप लोग राशि वसूलें और कुर्की करें। फिर न्यायालय में मामला दायर करें। वहां से जब आदेश होगा तब उसे पकडऩे जाएंगे और कार्रवाई करेंगे। इससे परेशान जिला सहकारी बैंक सिंहपुर के शाखा प्रबंधक ने वरिष्ठ कार्यालय से एफआइआर दर्ज कराने में मदद मांगी है। उल्लेखनीय है कि इसी तरह पहले करोड़ों रुपए के घोटाले के आरोपी रामलोटन तिवारी पर पर कलेक्टर के निर्देश के बाद भी पुलिस द्वारा प्रकरण दर्ज नहीं किया जा रहा था। हालांकि तत्कालीन कलेक्टर नरेश पाल ने मामले की नियमित समीक्षा के बाद जब एसपी से बात की तब जाकर किसी तरह एफआईआर दर्ज हो सकी थी। लेकिन, इसमें भी पुलिसिया सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। माना जाता है कि सहकारिता मामले में हुए गबन घोटालों में पुलिस को बैक डोर से काफी फायदा पहुंचाया जाता है।
जानकारी के अनुसार, तत्कालीन सेवा सहकारी समिति भंवर में समिति प्रबंधक रामायण प्रसाद शुक्ला ने 50,51,322 रुपए का गबन किया है। मामले में नियमानुसार एफआइआर दर्ज कराने समिति प्रबंधक रामकुमार वर्मा एवं शाखा प्रबंधक सिंहपुर थाने पहुंचे। लेकिन, थाना प्रभारी अरुण कुमार ने यह कहते हुए एफआइआर दर्ज करने से इंकार कर दिया कि जांच प्रतिवेदन में वसूली योग्य राशि लिखी है तो आप वसूल करो कुर्की करो। इसकी एफआइआर नहीं होगी।
यह है मामला
सेवा सहकारी समिति मर्या. भंवर के तत्कालीन समिति प्रबंधक रामायण प्रसाद शुक्ला पर आर्थिक अनियमितता प्रमाणित होने पर अगस्त 2012 को कार्रवाई के लिए शाखा प्रबंधक ने मुख्यालय को सूचना दी। इस दौरान तमाम कार्रवाई के बाद फरवरी 2015 में रामायण प्रसाद शुक्ला समिति प्रबंधक को निलंबित कर दिया गया। इसके विरुद्ध संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं के यहां अपील होने पर निलंबन में स्थगन मिल गया। मार्च 15 में रामायण को आरोप पत्र जारी किए गए। अप्रेल 2015 में उन्हें बहाल कर दिया गया। इधर मई 2015 में विभागीय जांच वित्तीय विश्लेषक द्वारा प्रारंभ की गई। लेकिन, आरोपी की आपत्ति पर जांच अधिकारी बदला गया। नए जांच अधिकारी ने आरोपी रामायण शुक्ल को जांच के लिए बुलाया गया पर वे उपस्थित नहीं हुए। इस पर जांच अधिकारी ने शाखा में मौजूद दस्तावेजों के आधार पर जुलाई 2016 को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसमें 91.25 लाख रुपए की राशि वसूली योग्य पाई गई। जिसे जमा करने नोटिस दिया गया। इस पर अगस्त 2016 को रामायण शुक्ला ने जांच दोषपूर्ण बताया। बोर्ड से विभागीय जांच कराने का निर्णय लिया गया और कमेटी गठित कर जांच शुरू की गई। दिसंबर 2017 में इस दल ने 58.55 लाख एवं 18 फीसदी ब्याज को गबन माना और इसे जमा करने रामायण शुक्ला को नोटिस दिया गया। इधर बैंक स्टाफ उप समिति के निर्णय पर 8.04 लाख रुपए का समायोजन रामायण को देय स्वत्वों से कर लिया गया। साथ ही समिति प्रबंधक पर रामायण पर एफआइआर कराने सहित शेष बची गबन की राशि की वसूली के लिए आरोपी के विरुद्ध सहकारी न्यायालय में धारा 64 के तहत वाद दायर करने आदेश दिया गया। इसके साथ ही बैंक विधि के अनुसार 22 मई 2018 को आरोपी के विरुद्ध थाने में एफआइआर दर्ज करने कहा गया। लेकिन तत्कालीन अधिकारी द्वारा एफआइआर न कराने पर रिमाइंडर दिया गया। इसके बाद तीसरा रिमाइंडर दिया गया और फिर भी एफआइआर नहीं होने पर रामकुमार वर्मा समिति प्रबंधक भंवर द्वारा एफआइआर दर्ज नहीं कराने तथा धारा 64 के तहत वाद दायर नहीं करने पर रामायण प्रसाद शुक्ला सहित रामकुमार वर्मा समिति प्रबंधक पर भी एफआईआर दर्ज करने निर्देश दिए गए। लेकिन अब स्थिति यह है कि जब समिति प्रबंधन एफआईआर दर्ज कराने पहुंचे तो थाना प्रभारी ने उल्टे पांव उन्हें बिना एफआइआर दर्ज किये लौटा दिया।
पुलिस पर गंभीर आरोप
सहकारिता मामले में जिस तरीके से लाखों के गबन और घोटालों के आरोपों पर पुलिस का रवैया है, उससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लग रहे हैं। सहकारिता में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि पुलिस मामले में आरोपियों को बचाने की कोशिश में जुटी रहती है।
Published on:
23 Apr 2019 11:33 pm
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