4 अप्रैल 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सावन मास: विंध्य क्षेत्र के इन मंदिरों का जानें पूरा इतिहास, जहां दर्शन मात्र से होती है मनोकामना पूरी

भोलेनाथ के जयकारों से गूंजें शिवालय, विंध्य क्षेत्र के कई शिव मंदिरों का वर्णन वेद और पुराण में भी

3 min read
Google source verification

सतना

image

Suresh Mishra

Jul 28, 2018

Story of birsinghpur shiv mandir mahamrityunjaya matsyendranath temple

Story of birsinghpur shiv mandir mahamrityunjaya matsyendranath temple

सतना। हिंदू पंचांग के 12 महीनों में सबसे पवित्र शिव का प्रिय मास सावन 28 जुलाई यानी शनिवार से प्रारंभ हो गया है। अधिकमास के चलते इस वर्ष श्रावण मास पूरे 30 दिन होगा। शिवभक्तों के लिए सावन इसलिए भी खास है, क्योंकि इस माह पांच सोमवार पड़ रहे हैं। सावन माह शुरू होने से पहले ही शिवालयों में चहल-पहल बढ़ गई है। विंध्य प्रदेश में इसका अलग ही महत्व है।

विंध्य की धरती पर अनेक एेसे शिव मंदिर हैं, जिनका वर्णन वेद एवं पुराणों में भी मिलता है। रीवा का महामृत्युंजय मंदिर हो या बिरसिंहपुर का गैवीनाथ धाम। चित्रकूट में मंदाकिनी के तट पर बैठे मत्यगजेंद्रनाथ हों या कालिंजर के किले में बिराजे नीलकंठ महादेव। हर शिवालय का अपना अलग महत्व है। सावन के इस पवित्र मास की शुरुआत पर विंध्य के प्रसिद्ध शिव मंदिरों पर पत्रिका की यह रिपोर्ट।

बिरसिंहपुर : गैवीनाथ धाम
बिरसिंहपुर में गैवीनाथ धाम है। यहां खंडित शिवलिंग की पूजा होती है। इसका इतिहास बड़ा ही निराला है। कहते हैं कि 314 वर्ष पहले मुगल शासक औरंगजेब ने देवपुर नगरी में हमला किया था। उसी दौरान गैवीनाथ धाम के शिवलिंग को तोडऩे का प्रयास किया। उसकी सेना ने जैसे ही शिवलिंग पर वार किया, मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। औरंगजेब सहित पूरी सेना को जान बचाकर भागना पड़ा था। बताते हैं कि शिवलिंग के ऊपर 5 टांकिया (लोहे की छेनी-हथौड़े से वार) लगवाई थी। पहली टांकी से दूध, दूसरी टांकी से शहद, तीसरी टांकी से खून, चौथी टांकी से गंगाजल, पांचवीं टांकी से भंवर (मधुमक्खी) निकली थी। उसके बाद औरंगजेब व सेना को भागना पड़ा था। तब से खंडित शिवलिंग की पूजा होते आ रही है।

चित्रकूट: मत्यगेंद्रनाथ मंदिर
चित्रकूट आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था का केंद्र है। यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव का निवास करते हैं। भगवान विष्णु ने श्रीराम रूप में वनवास काटा तो ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए यज्ञ किया था। उस यज्ञ से प्रकट शिवलिंग धर्मनगरी में आज भी विराजमान है। उन्हें भगवान शिव महाराजाधिराज मत्यगेंद्रनाथ के रूप में लोग सुख व समृद्धि के लिए वर्षों से पूजते आ रहे हैं। मत्यगेंद्रनाथ स्वामी का मंदिर मंदाकिनी नदी के तट पर रामघाट में स्थित है। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए रामघाट स्थित यज्ञदेवी अखाड़ा में यज्ञ किया था। 108 कुंडीय यज्ञ से मदमस्त हाथी की तरह झूमता हुआ एक शिवलिंग प्रकट हुआ था। इसकी स्थापना भगवान ब्रह्मा ने मत्यगेंद्रनाथ के रूप में रामघाट में की थी।

रीवा: महामृत्युंजय मंदिर
शिव के अनेक रूप हैं। उन्हीं रूपों में एक महामृत्युंजय भी है। कहते हैं कि इस रूप की पूजा और मंत्र के जाप से आने वाली हर विपत्ति टल जाती है। भगवान भोलेनाथ का यह रूप रीवा रियासत के किले में विराजमान है। सावन के महीने में प्रदेशभर से तो लोग यहां दर्शन के लिए आते ही हैं, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार से भी लोग मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। यहां रुक कर महामृत्युंजय मंत्र का जाप और अनुष्ठान कराते हैं। पुजारी महासभा के अध्यक्ष अशोक पाण्डेय बताते हैं, यह दुनिया का इकलौता मंदिर है जहां भोलेनाथ के महामृत्युंजय रूप के दर्शन होते हैं। अकाल मृत्यु, रोग और हर विपत्ति से मुक्ति देने वाला मंदिर है। वैसे तो भगवान भोलेनाथ के तीन नेत्र हैं पर यहां मौजूद शिवलिंग में तीन नहीं बल्कि एक हजार नेत्र (छिद्र) विद्यमान है। शिवलिंग का रंग सफेद है, जो मौसम के अनुसार बदल जाता है।

पन्ना: भगवान नीलकंठ मंदिर
मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा स्थित कालिंजर के किले में भगवान नीलकंठ की अद्भुत प्रतिमा है। कालिंजर पर्वत पर स्थापित इस किले के मंदिर में नीलकंठ भगवान के दर्शन करने हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सावन में इसका विशेष महत्व है। स्थानीय जानकार बताते हैं, वामन पुराण और वायु पुराण में भी कालिंजर और भगवान नीलकंठ का उल्लेख मिलता है। वामन पुराण में कालिंजर को भगवान नीलकंठ का निवास स्थान बताया गया है। पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के कारण भगवान का कंठ नीला हो गया था। इसीलिए उन्हें नीलकंठ कहा जाता है। उन्होंने यहीं पर काल नामक दैत्य को भस्म किया था। इससे इसका नाम कालिंजर पड़ गया। किले के पश्चिम में नीलकंठ महादेव का प्राचीन मंदिर बना है। मंदिर मार्ग पर कई गुफाएं हैं।