
the story of my life france women
मझगवां जनपद क्षेत्र में सरकारी योजनाओं से अनजान लोगों के लिए वे प्रशासन को जिम्मेदार मानती हैं। शुक्रवार को पत्रिका से मुलाकात में सिस्टम के नकारेपन से खिन्न फ्रांसीसी प्रोग्रामर ने दो टूक कहा-डीएम साहब! यहां सिस्टम कागजों पर चल रहा है।
उन्हें एक संत ने बताया, चित्रकूट जाइए
डेलफीन ने बताया, भारत भ्रमण पर आई थी। मप्र के ओंकारेश्वर में मंदिरों के दर्शन के दौरान उन्हें एक संत ने बताया कि आध्यात्मिक स्थल देखना है तो चित्रकूट जाइए। पर्यटन नक्शे में चित्रकूट को तलाश कर दो साल पहले पहुंची तो यहीं रम गई। भगवान राम से अभिभूत जब ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण किया तो बेकारी, गरीबी और भुखमरी देखकर रहा न गया। ऐसे में यहीं रहकर मदद का बीणा उठाया।
हवा हवाई दावे
पत्रिका टीम उनके कार्यस्थल लोखरिहा गांव पहुंची तो उत्साहित डेलफीन ने ग्रामीणों को एकत्र किया। फिर समस्याओं का जिस तरीके से गिनाना शुरू हुआ तो कमोवेश यह तो स्पष्ट हो गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी योजनाएं कागजों पर चल रही हैं। चित्रकूट चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री सहित सरकार के नुमाइंदे भले ही शत-प्रतिशत पात्रों को पेंशन देने का दावा करते रहे हों।
अब क्यों नहीं जुड़ रहा?
लेकिन लोखरिहा में यह सब हवा हवाई दिखा। चंदी कोल 60 की उम्र पार कर चुकी विधवा है। डबडबाई आंखों से बताया कि उनके पति चककू का निधन हो चुका है। शुरू में उन्हें विधवा पेंशन मिलती थी। अब सब बंद हो चुका है। जब भी सचिव को बताते हैं तो बस यही कहा जाता है कि नाम कट गया है। नाम क्यों कट गया? अब क्यों नहीं जुड़ रहा? पूछने पर सिर्फ डांट मिलती है।
हालात जस के तस
डेलफीन बताती हैं, अशिक्षा के कारण आदिवासी हक से वंचित हैं। समस्याओं को लेकर डीएम को बताया भी। वे स्वयं कुछ ग्रामीणों को लेकर डीएम से मिलीं। लेकिन हालात नहीं बदले। पानी का गंभीर संकट आज भी जस का तस है। आधा गांव पेयजल की सुविधा से वंचित है। सरपंच भी उनकी हां में हां मिलाते हैं और कहते हैं पीएचई को ग्रामसभा का प्रस्ताव भी भेजा पर कुछ नहीं हुआ।
पलायन कर गए युवा, गांव में सिर्फ बुजुर्ग
100 से अधिक युवा पुरुष और महिलाओं के पलायन के बाद गांव में ज्यादातर बुजुर्ग ही बचे हैं। इनमें महिलाओं की संख्या सबसे अधिक है। ग्रामीणों ने बताया, उनकी उम्र अब काम करने लायक नहीं बची है। यहां काम भी नहीं है। लिहाजा, राशन दुकान से मिलने वाला खाद्यान्न ही सहारा है।
माह में एक बार ही दुकान खुलती
यहां दो दुकानें हैं। एक दुकान प्रेमलाल दूसरा गणेशा चलाता है। माह में एक बार ही दुकान खुलती है। यदि उस समय कोई राशन लेने से चूक गया तो फिर खाद्यान्न नहीं मिलता है। उसके बाद अगले माह का ही खाद्यान्न दिया जाता है। मिट्टी के तेल की तो कहानी ही अलग है। कभी दिया जाता है तो कभी नहीं।
अब यही मेरी कर्मस्थली
चित्रकूट की आध्यात्मिकता से डेलफीन काफी अभीभूत है। उन्होंने कहा, यहां आकर खुद को ऐसा महसूस किया कि यह भगवान की आवाज थी। फ्रांस में नौकरी में काफी पैसा कमाया, लेकिन संतुष्टि यहां आकर मिली। नानाजी को अपना आदर्श मानने वाली डेलफीन ने कहा कि यहां वातावरण निर्माण की जरूरत है। योजनाएं होने के बाद भी लोगों को जानकारी नहीं है। है भी तो उनका लाभ पात्रों तक नहीं पहुंच रहा है।
आवाज बनने में काफी आत्मिक शांति मिलती है
ऐसे वंचित लोगों की सेवा और उनकी आवाज बनने में काफी आत्मिक शांति मिलती है। वे अब चित्रकूट को ही अपनी कर्मभूमि मान कर यहीं काम करने की इच्छा रखती हैं। अब वे आदिवासी परिवारों के साथ हिलमिल कर उनके बीच रहकर उनकी समस्याएं सामने ला रही हैं। शीघ्र
ही वे विधायक नीलांशु चतुर्वेदी से भी मिलकर मदद की मांग करने वाली हैं।
Published on:
29 Dec 2017 01:43 pm
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