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रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान: इलाके की जंग को लेकर जान गवां रहे बाघ और बाघिन

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में इलाके को लेकर बाघों के बीच संघर्ष भी एक आम बात हो गई है। पिछले नौ सालों की बात की जाए तो यहां पर इलाके को लेकर हुए संघर्ष में नौ से अधिक बाघ-बाघिनों व शावकों की मौत हो गई है।
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सवाईमाधोपुर. रणथम्भौर में आपस में लड़ते बाघ फाइल फोटो। Photo- Patrika

सवाईमाधोपुर। रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान देसी-विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद है और प्रदेश में सबसे अधिक बाघ-बाघिन होने के कारण साइटिंग भी सबसे अधिक होती है, लेकिन यहां इलाके को लेकर बाघों के बीच संघर्ष भी एक आम बात हो गई है। पिछले नौ सालों की बात की जाए तो यहां पर इलाके को लेकर हुए संघर्ष में नौ से अधिक बाघ-बाघिनों व शावकों की मौत हो गई है।

50 बाघों की बताई जा रही क्षमता

वन विभाग के अनुसार रणथम्भौर बाघ परियोजना में 50 से 55 बाघ बाघिनों के लिए पर्याप्त जगह है। लेकिन वर्तमान में यहां क्षमता से अधिक बाघ-बाघिन विचरण कर रहे हैं। ऐसे में इलाके को लेकर बाघों के बीच संघर्ष की आशंका बढ़ गई है।

नहीं मिल पा रही टेरेटरी के लिए पर्याप्त जगह

नेशनल टाइगर कन्जर्वेशन अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एनटीसीए) की ओर से जारी की गई गाइडलाइन के अनुसार बाघ या फिर बाघिन को अपनी टेरेटरी बनाने के लिए 20 से 22 वर्ग किमी का इलाका चाहिए होता है, लेकिन वर्तमान में रणथम्भौर में वर्तमान में क्षमता के अधिक बाघ-बाघिन होने के कारण बाघों की टेरेटरी का इलाका 14 से 16 वर्ग किमी तक सिमट कर रह गया है।

मां से अलग होने के बाद होती है परेशानी

वन अधिकारियों ने बताया कि आम तौर पर दो से ढाई साल तक शावक बाघिन के साथ ही विचरण करते हैं। इस दौरान मां से शिकार और जंगल में सरवाइव करने के गुर सीखने के बाद शावक मां से अलग होकर जंगल में अपनी नई टेरेटरी बनाते है। इस दौरान ही व्यवस्क बाघ के साथ उनका संघर्ष होने की आशंका सबसे अधिक होती है।

हर साल जा रही औसतन एक बाघ की जान

रणथम्भौर में पिछले नौ सालों में टेरिटोरियल फाइट में अब तक नौ बाघ-बाघिनों की जान जा चुकी है। ऐसे में हर साल औसतन रणथम्भौर में इलाके को लेकर होने वाले संघर्ष में एक बाघ अपनी जान गवां रहा है।

वर्तमान में यह है बाघों का आंकडा

वन अधिकारियोंं ने बताया कि रणथम्भौर में वर्तमान में 21 बाघ, 20 बाघिन और 16 से अधिक शावक है। साथ ही रणथम्भौर के दूसरे डिवीजन में भी वर्तमान में करीब दस बाघ-बाघिन और शावक विचरण कर रहे हैं। यदि इसमें धौलपुर के इलाके को शामिल किया जाए तो यहां भी करीब दस बाघ बाघिन और शावक हैं।

यह हो सकता है समाधान

वन अधिकारियों ने बताया कि बाघों के बीच आपसी संघर्ष को रोकने का एक मात्र उपाय प्राकृतिक टाइगर कॉरिडोर विकसित करना, बाघ परियोजना के आसपास बसे गांवों को विस्थापित करना और बाघों को अन्यत्र शिफ्ट करना ही है।

इनका कहना है

डब्ल्यूआइआइ की रिपोर्ट में रणथम्भौर में क्षमता से अधिक बाघ-बाघिन माने गए हैं और यह सही भी है। इससे बाघों के बीच इलाके को लेकर संघर्ष की आशंका भी रहती है। विभाग की ओर से बाघों को मैनेज करने और कॉरिडोर विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

  • मानस सिंह, उपवन संरक्षक, रणथम्भौर बाघ परियोजना।

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