एक बार फिर से सुर्खियों में रणथम्भौर ‘क्वीन‘, नक्शे में ढलेंगे ‘मछली’ के जीन

एक बार फिर से सुर्खियों में रणथम्भौर ‘क्वीन‘, नक्शे में ढलेंगे ‘मछली’ के जीन

Dinesh Saini | Publish: Oct, 13 2018 04:08:35 PM (IST) Sawai Madhopur, Rajasthan, India

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सवाईमाधोपुर। रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान की शान व ‘क्वीन ऑफ रणथम्भौर’ (Queen of Ranthambore) के नाम से प्रसिद्ध बाघिन टी-16 मछली (Machli) मौत के बाद भी एक बार फिर से सुर्खियों में है। अब वैज्ञानिक मछली के जीन प्रारूप का अध्ययन करने व जीन को नक्शे में ढालने की कवायद में जुट गए हैं। इससे देश के अन्य टाइगर रिजर्व के बाघों के व्यवहार व उनमें हो रहे जेनेटिक डिसआर्डर के बारे में पता किया जाएगा। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बैंगलूरू की नेशनल सेंटर फॉर बॉयोलॉजिकल साइसेंज (एनसीबीएस) में पांच वैज्ञानिकों की एक टीम मछली के जीवाश्म व जीन का विश्लेषण कर रही है।

छह माह में तैयार होगा नक्शा
बेंगलूरू में अभी मछली के जीवाश्म का अध्ययन किया जा रहा है। अध्ययन पूरा होने के बाद वैज्ञानिकों की टीम इसे नक्शे के रूप में ढालेगी। इसमें 6 माह तक का समय लग सकता है।

मृत्यु के समय लिया था सैंपल
वन अधिकारियों ने बताया कि अगस्त 2016 में मछली की मौत के समय चिकित्सकों की टीम ने मछली के डीएनए का सैंपल लिया था। इस सैंपल को बाद में शोध कार्य के लिए बेंगलूरू के एनसीबीएस भेज दिया गया था।

यह है उद्देश्य
वन अधिकारियों की माने तो इससे मछली के जीन प्रारूप को समझने में आसानी होगी। साथ ही रणथम्भौर व अन्य अभयारण्यों में बाघों के जेनेटिक डिसऑर्डर व बिगड़ते अनुपात के कारणों का भी खुलासा हो सकेगा।

इन चीजों का होगा अध्ययन
मछली के डीएनए से सैंपल से विशेषज्ञों की टीम मछली व मछली के वंशजों का मेटाबोलिज्म, ताकतें, सूंघने की क्षमता, पाचन शक्ति आदि का अन्य बाघ बाघिनों के साथ तुलना करेंगे।

11 शावकों को दिया था जन्म
रणथम्भौर में मछली ने कुल 11 शावकों को जन्म दिया था। 20 साल तक जीवित रही मछली ने 2006 से 2016 तक पर्यटकों को खासा आकर्षित किया था। इन दस सालों में सरकार को सालाना करीब 65 करोड़ के राजस्व की आय हुई थी।

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