4 सितंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

सवाईमाधोपुर रणथम्भौर में पूरा हुआ टारगेट टी-106

सवाईमाधोपुर रणथम्भौर में पूरा हुआ टारगेट टी-106
2 min read
Google source verification
sawaimadhopur

Ranthambhor park in sawaimadhopur

सवाईमाधोपुर. रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान। सुबह करीब सात बजे। वन विभाग की टीमें जंगल की ओर दौड़ती नजर आई। टीम सदस्य जिप्सियों में सवार थे। उनका टारगेट था टी-106। क्योंकि वन विभाग ने इसे ही मुकुंदरा भेजने के लिए चिह्नित कर लिया था। सभी की नजरें पार्क के जोन नम्बर एक स्थित सुल्तानपुर इलाके पर थी। क्योंकि बाघिन टी-106 पिछले कुछ दिनों से इसी इलाके में नजर आ रही थी। सुल्तानपुर के अलग अलग रूट पर एक-एक जिप्सी घूमती रही। वायरलैस सेट बजते रहे। मैसेज चल रहे थे कि कहीं से कॉल आई है क्या। इस बीच सुबह करीब नौ बजे वाई के साहू भी वहां पहुंचे। ट्रेकिंग में जुटे वनाधिकारियों से जानकारी ली। फिर सभी एक बार फिर बाघिन की तलाश करते नजर आए। लेकिन बाघिन की एक झलक तक नहीं दिखी।

नौ घंटे तक इंतजार कराया
बाघिन के निकलने का अधिकारियों को बेसब्री से इंतजार था। उनका एक-एक पल मुश्किल हो रहा था। इंतजार की घडिय़ा बढ़ी तो दोपहर से शाम होने को आई। इस बीच पौने चार बजे पक्षियों एवं बंदरों की कॉल आना शुरू हो गई। वनाधिकारियों की कुछ उम्मीदें जागी। एक जिप्सी में सवार सहायक वन संरक्षक संजीव शर्मा को आखिर वह सुल्तानपुर में खारया चाटा स्थान पर दिखी। बाघिन झाडिय़ों के बीच से निकलती हुई थी। उसे देखकर उनकी आंखों में चमक सी आइ गई। उन्होंने अपने अधिकारियों एवं टें्रकुलाइज टीम को वायरलैस मैसेज किया।

सांभर के शिकार की टोह में थी
बाघिन भूख लगने के कारण शिकार की तलाश में बाहर आई थी। आसपास उसे सांभर नजर आ रहे थे। इस दौरान वह शिकार की तैयारी में थी। लेकिन वह खुद वन विभाग के बिछाए जाल में फंस गई। बाघिन झाडिय़ों से निकलकर कच्चे रास्ते में आकर बैठ गई थी। ऐसे में वनाधिकारियों के लिए उसे ट्रंकुलाइज करना और आसान हो गया। बाघिन ने अधिकारियों को इंतजार ही कराया था, लेकिन ट्रंकुलाइज करने में उनको ज्यादा नहीं छकाया।

एक डॉट में ही हो गई बेहोश
ट्रंकुलाइज टीम में पशु चिकित्सक डॉ. राजीव गर्ग, ट्रंकुलाइज एक्सपर्ट वनकर्मी राजवीर सिंह आदि ने अपनी जिप्सी बाघिन के कुछ नजदीक ले जाकर खड़ी की। फिर डॉ. राजीव गर्ग के निर्देशन में बाघिन को डॉट (इंजेक्शन) लगाया गया। बाघिन एक डॉट लगते ही कुछ मिनट में बेहोश हो गई।

130 किलो वजनी
बाघिन के बेहोश होने के करीब कुछ मिनट तक वनाधिकारियों ने इंतजार किया। ताकि वह पूरी तरह से होश में नहीं आ पाए। पूर्ण संतुष्टि होने के बाद ट्रंकुलाइज टीम जिप्सी से नीचे उतरी। उसे स्ट्रेचर पर रखा। इसके बाद उसके मेडिकल जांच की। एसीएफ संजीव शर्मा के अनुसार बाघिन का वजन 130 किलो था। बाघिन करीब 23 माह की उम्र की है।

पांच मिनट में आ गया था होश
एसीएफ संजीव शर्मा ने बताया कि बाघिन के मेडिकल जांच में करीब एक से सवा घंटे का समय लगा। इसके बाद उसे पिंजरे में रख दिया गया। पिंजरे को कैंटर में रखा गया। इसके बाद डॉ. राजीव गर्ग ने बाघिन को बेहोशी से वापस होश में लाने के लिए रिवाइवल का इंजेक्शन लगाया। बाघिन को करीब पांच मिनट के भीतर होश भी आ गया था। वह पूरी तरह स्वस्थ थी।

ये लोग थे मौजूद
जब बाघिन को टं्रकुलाइज किया गया। उस समय रणथम्भौर के मुख्य वन संरक्षक वाईके साहू, डीएफओ मुकेश सैनी, एसीएफ संजीव शर्मा, पशु चिकित्सक डॉ. राजीव गर्ग, ट्रंकुलाइज एक्सपर्ट राजवीर सिंह, रेंजर नारायण सिंह, वाइल्ड लाइफ बायोलॉजिस्ट गिरीश पंजाबी, मुुकुंदरा के सीसीएफ घनश्याम शर्मा आदि मौजूद थे।

बड़ी खबरें

View All

सवाई माधोपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग