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टाइगर डे स्पेशल: ये हैं रणथम्भौर के असली ‘टाइगर’, जिस बाघ ने किया हमला, उसे आज भी करते हैं ट्रैक

स वाईमाधोपुर रणथम्भौर ( Sawai madhopur Ranthambore ) को बाघों की नगरी के नाम से सारे विश्व में जाना जाता है। देश विदेश के लोग यहां बाघों व अन्य वन्य जीवों की अठखेलियां देखने आते हैं। रणथम्भौर में बेहतर संरक्षण के कारण यहां बाघों के कुनबे में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन यहां कुछ ऐसे हीरोज भी हैं जो बाघों व अन्य वन्यजीवों के संवर्धन व संरक्षण के लिए सालों से लगातार काम कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं ( Tiger Day Special ) रणथम्भौर में सालों से मुस्तैदी से बाघों के संरक्षण के लिए काम कर रहे फोरेस्ट गाड्र्स की, जिन्होंने कई बार अपनी जान को खतरे में डालकर बाघ व अन्य वन्यजीवों की जान बचाई है। पेश है शुभम मित्तल की रिपोर्ट-

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केस 1 : जिस बाघ ने किया हमला, उसे आज भी करते हैं ट्रैक
बाघों के प्रति समर्पित वन अधिकारियों की फेहरिस्त में ( Tiger Day Special ) रणथम्भौर के पूर्व एसीएफ दौलत सिंह का नाम भी शिद्दत से शुमार किया जाता है। उनके बाघों के प्रति प्रेम का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रणथम्भौर के जिस बाघ ने सालोंं पहले उनपर हमला किया था उसे वह आज भी ट्रैक करते हैं। बात नौ साल पहले की है जब अगस्त 2010 में जब दौलत सिंह शक्तावत को एक फोन आया कि बाघ टी-7 गांव के एक खेत में आ गया है और उसने भैंस का शिकार किया है। दौलत सिंह तुरंत रेस्क्यू टीम के साथ मौके पर पहुंचे। बाघ गांव में बाजरे के खेत में छिपा हुआ था। बाजरे की फसल बड़ी होने के कारण बाघ आसानी से नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में बाघ को ट्रेंकुलाइज करने के लिए दौलत सिंह को खेत में बाघ के नजदीक जाना पड़ा।

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जब बाघ उनसे महज 25 मीटर की दूरी पर था तो बाघ ने अचानक उनपर हमला बोल दिया। इससे दौलत सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए । घटना के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए प्राइवेट जेट भेजा और जयपुर में उनका उपचार हुआ। बाघ के हमले में उनकी एक आंख खराब हो गई, लेकिन कई दौर की सर्जरी के बाद चिकित्सकोंं ने उनके चेहरे के दांयी ओर तीन प्लेट व 22 स्क्रू व आर्टिफिशल आंख लगाकर उन्हें नया जीवन दिया। इसके बाद भी उनका बाघों के प्रति लगाव कम नहीं हुआ। ठीक होने के बाद वह फिर से काम पर लौटे और बाद में जब बाघ टी-7 को सरिस्का शिफ्ट किया गया तब भी वह उस ऑपरेशन का हिस्सा रहे। फिलहाल रणथम्भौर के इस बाघ को सरिस्का में एसटी-6 के नाम से जाना जाता है।

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इतना ही नहीं दौलत सिंह ने सेवानिवृति के बाद भी बाघों का साथ नहीं छोड़ा है और वह अब भी कोटा में वनकर्मियों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहे हैं। उन्होंने रणथम्भौर में कार्यकाल के दौरान अपने अनुभवों व बाघ के साथ उनके संघर्ष पर आधारित 'माय एनकाउंटर विद ए बिग कैट एण्ड अदर एडवेंचर्स इन रणथम्भौरÓ नाम से एक किताब भी लिखी है। इनमें उन्होंने अपने अनुभवों को साझा किया है।

केस2 : मछली को दिया था नया जीवन
रणथम्भौर की प्रसिद्ध बाघिन टी-16 मछली की पीढिय़ों तक टे्रकिंग करने वाले मोहनसिंह भी ऐसे ही एक फोरेस्ट गार्ड हैं। वर्तमान में यह जोन छह के गेट पर तैनात है। मोहन सिंह ने बताया कि 2013 में मछली द्वारा मगरमच्छ का शिकार करने के दौरान मछली के कैनाइन (शिकार में काम आने वाले आगे के दो दांत) टूट गए थे। इसके बाद मछली शिकार नहीं कर पाती थी। मछली का एक नाखून भी टूट गया था। ऐसे में तात्कालीन डीएफओ सुदर्शन शर्मा ने मछली की देखरेख की जिम्मेदारी फोरेस्ट गार्ड मोहन सिंह को सौंपी। मोहन सिंह ने कई माह तक मछली की देखरेख की। इस दौरान मछली ने तीन मादा शावकों को भी जन्म दिया। कैनाइन नहीं होने के बाद भी मछली तीन साल और जिंदा रही।


मां से बिछड़े पैंथर को सिखाया शिकार करना : ऐसा ही कुछ काम उन्होंने 2006 में ड्यूटी के दौरान भी किया। उस समय वह जोन आठ में तैनात थे। एक दिन अचानक पैंथर का बच्चा मां से बिछड़कर जंगल में बकरी चराने गए ग्रामीणों की बकरियों के झुण्ड के साथ आ गया। इस पर ग्रामीणों ने जोन आठ में तैनात मोहन सिंह को इसकी जानकारी दी। इसके बाद मोहन सिंह ने तात्कालीन डीएफओ आरएस शेखावत के निर्देश पर पैंथर के छोटे से बच्चे को पिंजरे में रखकर करीब डेढ़ साल तक उसकी देखभाल की, लेकिन इससे पैंथर का शावक शिकार करने के गुर नहीं सीख सका। इसके बाद मोहनसिंह ने ही पैंथर के शावक को शिकार करना सिखाया। उन्होंने करीब एक साल तक पैंथर को छोटे जानवरों का शिकार करना सिखाया। इसके बाद शिकार में पारंगत होने के बाद चार साल की उम्र में उसे जंगल में छोड़ा।

केस3 : बाघ के हमले से भी नहीं डिगा हौसला
कुछ ऐसी ही कहानी रणथम्भौर में 20 सालों से बाघों की ट्रेकिंग कर रहे फोरेस्ट गार्ड से सहायक वनपाल बने हरलाल सैनी की है। यह रणथम्भौर में बाघों की सुरक्षा के लिए जंगल में 20 सालों से पैदल गश्त कर रहे हैं। पिछले करीब पंद्रह सालों से कुण्डेरा रेंज की अनदपुरा चौकी पर तैनात है। बाघों व अन्य वन्यजीवों के प्रति उनके समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2010 में जंगल में पैदल गश्त के दौरान कुण्डेरा रेंज में दर्रा चौकी से पहले नॉन ट्यूरिज्म जोन में झाडिय़ों में बैठे बाघ ने हरलाल पर हमला कर दिया था। इससे उनके हाथ पर चोट आई थी। इसके बाद भी आज तक उनका हौंसला कम नहीं हुआ है। हालांकि वन्यजीवों की नि:स्वार्थ सेवा के लिए करीब एक साल पहले विभाग की ओर से उनकी पदोन्नति कर उन्हें सहायक वनपाल बनाया गया है।

केस4 : 15 सालों में 15 से अधिक बाघों का किया उपचार
रणथम्भौर में बाघों के संरक्षण व उपचार में वनकर्मियों, अधिकारियों के साथ-साथ पशु चिकित्सक डॉ. राजीव गर्ग का भी अहम योगदान रहा है। डॉ. राजीव गर्ग पिछले 15 सालों से रणथम्भौर में बाघों के उपचार का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 15 सालों में अब तक रणथम्भौर में 15 से अधिक बाघों का उपचार कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि जनवरी 2018 में बाघिन टी-8 के शावक ने एक जंगली ***** का शिकार किया था। इससे उसे डिहाइड्रेशन हो गया था। ऐसे में बाघ को ट्रेंकुलाइज कर डॉ. राजीव गर्ग ने बाघ का उपचार किया। तीन दिन तक बाघ को पिंजरे में रखकर उसे ड्रिप व इंजेक्शन लगाए गए। साथ ही बाघ को ऑक्सीजन भी दी गई। इसके बाद बाघ मौत के मुंह से बाहर आया। इतना ही नहीं 2015 में रणथम्भौर के टी-24 को भी पेट में जंगली ***** के बाल फंसने से कब्ज की समस्या हो गई थी। इस समय भी डॉ. राजीव गर्ग ने बाघ का उपचार कर उसे नई जिंदगी दी थी।


केस5: मुश्किल परिस्थितियों में बाघ को ट्रेंकुलाइज कर बचाई जान
जब-जब बाघ जंगल से निकलकर आबादी क्षेत्र की ओर आता है तो हमें वन विभाग की रेस्क्यू टीम की याद आती है। रेस्क्यू टीम के सदस्य अपनी जान को जोखिम में डालकर बाघ व अन्य वन्यजीवों को ट्रेंकुलाइज करते हैं। रणथम्भौर में एक भी डिग्रीधारी ट्रेंकुलाइज एक्सपर्ट नहीं है। फिर भी पद से सहायक वनपाल राजवीर सिंह व फोरेस्ट गार्ड अतुल गुर्जर सालोंं से रणथम्भौर में बाघों का रेस्क्यू कर रहे हैं। राजवीर पिछले 17 सालों से यह काम कर रहे हैं। राजवीर अब तक 750 से अधिक वन्यजीवों को ट्रेंकुलाइज कर चुके हैं। वहीं उनके साथी अतुल गुर्जर भी तीन साल में 300 से अधिक वन्यजीवों का रेस्क्यू कर चुके हैं। राजवीर ने बताया कि रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी समस्या लोगों को समझाने की रहती है। 2006 में बाघ टी-20 खण्डार के एक गांव में आ गया था। सूचना पर खण्डार पुलिस मौके पर पहुंची तो ग्रामीणों ने पुलिस पर हमला कर दिया। इसके बाद वन विभाग की टीम ने खेत में बाघ को ट्रेंकुलाइज किया।

जब वन विभाग की टीम बाघ को ट्रेंकुलाइज कर ले जा रही थी तो ग्रामीणों ने वनकर्मियों पर भी हमले का प्रयास किया, लेकिन वनकर्मी बाघ को सुरक्षित लेकर वहां से निकल गए। राजवीर सिंह व अतुल गुर्जर की जोड़ी ने वन विभाग के लिए अब तक कई जटिल रेस्क्यू किए हैं। 2018 में जब रणथम्भौर के बाघ टी-91 को रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में ट्रेंकुलाइज कर मुकुंदरा शिफ्ट किया गया था तो पहले यह जिम्मेदारी कोटा वन विभाग व जयपुर की संयुक्त टीम को दी गई थी, लेकिन टीम को सफलता नहीं मिली। इसके बाद रणथम्भौर से राजवीर सिंह व अतुल गुर्जर को भेजा गया। दोनों ने अपनी टीम के साथ दो चरणों में करीब दस दिनों तक बाघ की ट्रेकिंग की और आखिकार 3 अप्रेल 2018 को बाघ को ट्रेंकुलाइज कर मुकुंदरा शिफ्ट किया गया। इतना ही नहीं अब तक कोटा के मुकुंदरा भेजी गई दोनों बाघिनों को भी इन दोनों ने ही ट्रेंकुलाइज किया था।