
सवाईमाधोपुर रणथम्भौर में कालू -धोलू के साथ बाघिन नूर।
सवाईमाधोपुर. सरिस्का बाघ परियोजना से एक बाघिन एसटी 5 लापता हुई। सूचना पर जहां पूरा वन विभाग हिल गया, वहीं दूसरी ओर यह खबर आग की तरह पूरे राजस्थान में फैल गई। बाघिन की तलाश शुरू हुई जो अब तक जारी है, लेकिन रणथम्भौर के दो बाघ डेढ़ साल से लापता हैं, लेकिन इन्हें तलाशने की जगह वन विभाग इंतजार में है कि वह वापस लौट आएंगे। इस आस में विभाग ने उन्हें तलाशने के लिए कोई कदम भी नहीं उठाए हैं।
यह है कालू-धोलू का इतिहास
रणथम्भौर की प्रसिद्ध बाघिन नूर टी 39 व सज्जनगढ़ बॉयोलोजिकल पार्क भेजे गए बाघ उस्ताद टी 24 के दो शावक 24 मई 2014 को जन्मे थे। विभाग ने इन्हें टी 88 व टी 89 नाम दिया। कुछ समय बाद उस्ताद को रणथम्भौर से सज्जनगढ़ शिफ्ट कर दिया गया। ऐसे में यहां नए बाघ टी 57 ने अपनी टेरेटरी बना ली, लेकिन नूर के साथ दोनों शावकों को मारने की अपेक्षा उनके साथ ही रहा।
अमरेश्वर वन क्षेत्र की ओर रहा मूवमेंट
जोन एक व दो टी-57 के दबदबा बना लेने के बाद दोनों शावक रणथम्भौर की बाहरी सीमा अमरेश्वर वन क्षेत्र, झूमर बावड़ी आदि इलाकों में विचरण करने लगे।
आबादी क्षेत्र में बढ़ गई थी गतिविधि
टी 88 व टी 89 की गतिविधियां आबादी क्षेत्र में भी बढऩे लगी थीं। करीब दो साल पहले जंगल से निकलकर बाघ कालू यानि टी 88 रामसिंहपुरा के एक खेत में आ गया था। यहां कई घंटों तक अमरूद के पेड़ के यहां बैठा रहा। इसके बाद वन विभाग की टीम ने बाघ का रेस्क्यू कर उसे वापस जंगल में छोड़ा था।
डेढ़ साल से नहीं है पता
बाघिन नूर के दो शावक टी 88 उर्फ कालू व टी 89 उर्फ धोलिया दो साल तक सुल्तानपुर, पाण्डूदेह आदि जोन 1 के क्षेत्र में अपनी मां के साथ दिखाई देते थे, लेकिन 30 दिसम्बर 2016 के बाद इन्हें किसी ने नहीं देखा। यह अंतिम बार बाघिन नूर के साथ रायपुर क्षेत्र में नजर आए थे। विभाग इन्हें लापता तो मान रहा है, लेकिन इनकी तलाश के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। विभाग का मानना है कि यह अपनी नई टेरेटरी के लिए अन्य जगह चले गए, लेकिन कहां गए इसका कोई पता नहीं है।
कहीं मप्र तो नहीं गए...
रणथम्भौर के बाघ-बाघिनों का टेरेटरी की तलाश में मध्यप्रदेश के कूनो अभयारण्य में जाने का क्रम भी रहा है। ऐसे ही बाघिन नूर के परिवार का मध्यप्रदेश से भी नाता रहा है। बाघिन नूर का भाई अपनी टेरेटरी की तलाश में मध्यप्रदेश के कूनो अभयारण्य में चला गया था। वहीं उसने अपनी टेरेटरी बना ली थी। ऐसे में वन्यजीव प्रेमियों का यह भी मानना है कि संभवतया यह दोनों बाघ भी मध्यप्रदेश निकल गए हो, लेकिन इन दोनों की तलाश नहीं होने से इस बात की पुष्टि भी वन विभाग नहीं कर सका है। एक अन्य बाघ भी मध्यप्रदेश तक गया था, लेकिन वहां अपनी टेरेटरी नहीं बना सका और वापस लौट आया।
कालू-धोलू लम्बे समय से नजर नहीं आ रहे हैं। अभी इनके बारे में पता नहीं है। सोमवार को जानकारी कर बताता हंू।
मुकेश सैनी, उपवन संरक्षक, रणथम्भौर बाघ परियोजना, सवाईमाधोपुर
Published on:
30 Jul 2018 12:25 pm
