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Navratri 2022: हर दुख, हर कष्ट हर ले ये सलकनपुर वाली मां

आज हम आपको एक ऐसे शक्ति पीठ के बारे में बता रहे हैं। जो कुछ साल पहले तक लोगों की पहुंच से दूर था। लेकिन जैसे ही इसकी महिमा भक्तों तक पहुंचने लगी हर वर्ष लाखों की संख्या में लोग यहां पहुंचने लगे हैं।

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सीहोर। शारदीय नवरात्रि साधना, आराधना और अध्यात्म का पर्व शुरू हो चुका है। हाथी पर सवार होकर आईं माता-रानी भक्तों को शक्ति और भक्ति दोनों दे रही हैं। प्रदेश में भी माता-रानी के सभी मंदिरों में भक्त माता का आशीर्वाद लेने पहुंच रहे हैं। मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा जारी है। इस दौरान माता के शक्तिपीठ के दर्शन अत्यधिक खास माने जाते हंै। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे शक्ति पीठ के बारे में बता रहे हैं। जो कुछ साल पहले तक लोगों की पहुंच से दूर था। लेकिन जैसे ही इसकी महिमा भक्तों तक पहुंचने लगी हर वर्ष लाखों की संख्या में लोग यहां पहुंचने लगे हैं। मान्यता है कि जो भी मां के इस मंदिर में दर्शन करने पहुंचता है उसकी सभी परेशानियां, मुश्किलें हरकर मां उन्हें खुशियों का आशीर्वाद देती हैं।

1000 फीट की ऊंचाई पर विराजी हैं मां
दरअसल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे जिले सीहोर में सलकनपुर नामक एक गांव है। यहां स्थित 1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजमान है बिजासन देवी, जिन्हें सलकनपुर माता के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि बिजासन देवी मां दुर्गा का अवतार हैं।
आपको बता दें कि माता का यह मंदिर भोपाल से 75 किमी दूर है। वहीं यह पहाड़ी मां नर्मदा से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

पहाड़ी पत्थरों को पकड़कर मंदिर में जाते थे भक्त
आज भले ही इस मंदिर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन, करीब 50 साल पहले (1970 में) नवरात्र में पूरे 9 दिन में 5 हजार से ज्यादा श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते थे। उस समय यहां एक दिन में अधिकतम 500 श्रद्धालु आते थे। मंदिर छोटी मढिय़ा थी। सीढिय़ां नहीं थीं। ऐसे में श्रद्धालु पत्थरों को पकड़कर ऊपर जाते थे। यहां तक कि पीने का पानी भी कुएं से लाना पड़ता था।

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1100 साल पुराना मंदिर

सलकनपुर का मां विजयासन धाम प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल है। इसकी स्थापना का समय स्पष्ट रूप से नहीं पता लेकिन, माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1100 ई. के करीब गौंड राजाओं ने किला गिन्नौरगढ़ निर्माण के दौरान करवाया था।

सिद्धशक्ति पीठ भी है मंदिर
प्रसिद्ध संत भद्रानंद स्वामी ने मां विजयासन धाम में कठोर तपस्या की। उन्होंने नल योगिनियों की स्थापना कर क्षेत्र को सिद्ध शक्तिपीठ बनाया था। लाखों भक्त इस तपस्या स्थली पर पहुंचते हैं और मन्नत मांगते हैं।

हर कष्ट हरने वाली माता
मां बिजासन के दरबार में आने वाले दर्शनार्थियों की कोई पुकार कभी खाली नहीं जाती। भक्तों के बढ़ते हुए कदम जैसे ही इस धाम की परिधि पर पहुंचते हैं, पूरा शरीर मानो मां बिजासन की शक्ति से भर जाता है। माना जाता है कि मां विजयासन देवी पहाड़ पर अपने परम दिव्य रूप में विराजमान हैं। विध्यांचल पर्वत शृंखला पर विराजी माता को विंध्यवासिनी देवी भी कहा जाता है। वहीं यह भी मान्यता है कि देवी मां यहां आने वाले सभी भक्तों का दुख हर लेती हैं।

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रक्तबीज नामक राक्षस का किया था वध

पुराणों के अनुसार देवी विजयासन माता पार्वती की भी अवतार है जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध किया था और सृष्टि की रक्षा की थी। इसी पहाड़ी पर सैकड़ों जगहों पर रक्तबीज से युद्ध के अवशेष नजर आते हैं। बिजयासन देवी को कई लोग कुलदेवी के रूप में भी पूजते हैं। माता कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं, वहीं नि:संतानों की सूनी गोद भी भरती हैं।

1400 सीढिय़ां चढ़कर पहुंचते हैं दरबार में
इस मंदिर पर पहुंचने के लिए 1400 सीढिय़ों का रास्ता पार करना पड़ता है। जबकि इस पहाड़ी पर जाने के लिए कुछ वर्षों में सड़क मार्ग भी बना दिया गया है। यहां पर दो पहिया और चार पहिया वाहन से पहुंचा जा सकता है। यह रास्ता करीब साढ़े 4 किलोमीटर लंबा है। इसके अलावा दर्शनार्थियों के लिए रोप-वे भी शुरू हो किया गया है। इसकी मदद से यहां 5 मिनट में पहुंचा जा सकता है।

स्वयं-भू है माता की प्रतिमा
मां विजयासन देवी की प्रतिमा स्वयं-भू है। यह प्रतिमा माता पार्वती की है, जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लेकर बैठी हुई है। इस भव्य मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवान भैरव की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। भक्त कहते हैं कि एक मंदिर में कई देवी-देवताओं का आशीर्वाद पाने का सौभाग्य सभी को मिल जाता है।

किए जाते हैं ये धार्मिक आयोजन
नवरात्र में इस स्थान पर लाखों श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर चढ़ावा-चढ़ाने आते हैं। जमाल चोटी उतारने और तुलादान कराने भी पहुंचते हैं। परिसर सर्वसुविधायुक्त है।

दक्षिणमुखी पाषाण मूर्ति
वास्तुकला पर ध्यान दें तो माता रानी की दक्षिणमुखी पाषाण मूर्ति है। मूर्ति के सामने भैरव जी स्थापित हैं। वहीं मंदिर से कुछ दूरी पर करीब 18 से 20 फीट की गहराई पर एक शिव मंदिर भी बताया जाता है।

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बाघ करता है माता की परिक्रमा
बताया जाता है कि नजदीकी रातापानी के जंगलों से बाघ भी माता के मंदिर तक पहुंच जाता है। भक्त मानते हैं कि मां दुर्गा का यह वाहन माता के दर्शन करने के लिए मंदिर के आसपास तक पहुंच जाता है। कुछ ग्रामीण बताते हैं कि बरसों पहले जब यहां मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था तो बाघ मंदिर के आसपास ही रहता था। धीरे-धीरे भक्तों की श्रद्धा उमड़ी और आज बिजयासन देवी धाम बड़ा तीर्थ बन गया है।

ऐसे पहुंचे देवी मां के दरबार
यह मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 75 किमी की दूरी पर है। वहीं होशंगाबाद से 40 किमी की दूरी पर, इसके अलावा इंदौर से 180 किमी और सीहोर से 90 किमी की दूरी पर बस, कार, ट्रेन आदि के माध्यम से मां के इस धाम तक पहुंचा जा सकता है। अपना वाहन होने पर भोपाल से वाया औबेदुल्लागंज इसकी दूरी 75 किमी है। वहीं भोपाल से वाया कोलार डैम इसकी दूरी 65 किमी है।