
Sharad Yadav never seen in Parliament
शहडोल। कद्दावर समाजवादी नेता और जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव को लंबे समय बाद संसद में न देख शहडोल के पुराने समाजवादी नेता काफी मायूस नजर आए। याद हो कि हाल ही में शरद यादव और अली अनवर को राज्य सभा की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया गया है। यहां के समाजवादियों से शरद यादव के काफी पुराने रिश्ते रहे हैं। कई समाजवादियों को उनसे गहरा लगाव है। यहां के पुराने समाजवादी नेताओं का मानना है कि शरद यादव जैसे नेताओं की संसद में मौजूदगी बेहद जरूरी है।
शहडोल के समाजवादी नेता जनता दल की टूटन और आपसी झगड़े से भी काफी मायूस दिखे। उनका मानना है कि बिहार में जो वाकया हुआ उसी के चलते शरद यादव को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी। शरद यादव चूंकि जबलपुर के हैं। जबलपुर और शहडोल का फासला काफी कम होने के चलते शरद यादव की यहां भी सक्रियता रही है। यहां के कई आंदोलनों में उन्होंने भाग लिया। जिसके चलते उनके यहां भी लोगों से काफी संबंध अभी भी हैं।
इस घटनाक्रम से मैं काफी मायूस : जायसवाल
मध्यप्रदेश क्षेत्रीय आदिवासी विकास संघर्ष समिति के प्रदेश संयोजक और पुराने समाजवादी श्याम बाबू जायसवाल का कहना है कि इतने वरिष्ठ नेता को संसद में न देखकर अच्छा नहीं लगा। काफी निराशा हुई। शरद यादव दबंग और सजग सासंद रहे हं, सदन में ऐसे सांसद के ना रहने से देश को महत्वपूर्ण सुझावों से वंचित रहना पड़ेगा। अच्छे सांसद रहे, सजग रहे, मुखर रहे देश के संसद को चलाने में इनका सुझाव अहम रहा है। ऐसे इंटेलीजेंट सांसद को संसद के सदन में रिप्रजेंट ना करने देना लोकतंत्र के लिए सही नहीं रहेगा। उनका शहडोल से पुराना नाता रहा है। यहां पर वे काफी सक्रिय रहे हैं।
संसद की शान रहे हैं शरद यादव : खान
जनता दल से लंबे समय से जुड़े और कई पदों पर रहने वाले समाजवादी नेता सिकंदर खान का कहना है कि शरद यादव संसद की शान रहे हैं, चाहे वे राज्यसभा में रहे हों अथवा लोकसभा में। सही बात बोलने वाले लोग हैं। निडर लोग हैं, ऐसे लोगों को राज्य सभा में जाना जरूरी है। अच्छे लोगों को राज्यसभा से हटाकर गलत लोगों को लाया जाए। जो हां में हां मिलाएंगे उन्हें लाने की कोशिश होगी। जो सरकार की कमजोरी को उठाते हैं उनके हटाने का काम किया जा रहा है। उनका बर्खास्त होना दुखद है। लंबे समय बाद उन्हें सदन में न देखकर काफी दुख पहुंचा।
शरद यादव का शहडोल से पुराना नाता
शरद यादव का शहडोल से पुराना नाता रहा है। यहां पर उन्होंने कई आंदोलन, सभाएं कीं। चुनाव प्रचार में भी आए। कई लोगों से उनका काफी गहरा लगाव है। कई मर्तबा शहडोल आ चुके हैं। आमसभा करने आए। पिछले चुनाव में आए थे
जब सुंदर सिंह विधायक थे तब शहडोल प्रचार करने आए थे। कई बार शहडोल आ चुके हैं। चंन्द्रशेखर त्रिपाठी जुगल किशोर गुप्ता, नरेंन्द्र दुबे, जयप्रकाश गर्ग आदि उनके पुराने साथी रहे हैं।
युवावस्था में ही जबलपुर से चुने गए थे सांसद
मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, और फिर बिहार में अपना राजनीतिक परचम लहराने वाले शरद यादव बिहार की सत्ताधारी जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। शरद यादव का जन्म 1 जुलाई 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में एक गांव में किसान परिवार में हुआ, पढ़ाई के समय से ही राजनीति में दिलचस्पी रही और 1971 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज, जबलपुर मध्यप्रदेश में छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए. छात्र राजनीति के साथ वो पढ़ाई में भी इंटेलीजेंट रहे हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित होकर सक्रिय युवा नेता के तौर पर कई आंदोलनों में हिस्सा लिया और मीसा के तहत 1969-70, 1972 और 1975 में हिरासत में लिए गए, मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने वालों में शरद यादव ने अहम भूमिका निभाई।
पहली बार 1974 में मध्य प्रदेश की जबलपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. यह जेपी आंदोलन का समय था और वो किसान के रूप में जेपी द्वारा चुने गए पहले उम्मीदवार थे, 1977 में भी वो इसी लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे. उस वक्त वो युवा जनता दल के अध्यक्ष थे। 1986 में वो राज्यसभा से सांसद चुने गए और 1989 में यूपी की बदायूं लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर तीसरी बार संसद पहुंचे। 1989-90 में टेक्सटाइल और फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री रहे। 1991 से 2014 तक शरद यादव बिहार की मधेपुरा सीट से सांसद रहे। 1995 में उन्हें जनता दल का कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया और 1996 में वह पांचवी बार लोकसभा का चुनाव जीते। 1997 में उन्हें जनता दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। 13 अक्टूबर 1999 को उन्हें नागरिक उड्डयन मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया और एक जुलाई 2001 को वो केंद्रीय श्रम मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री चुने गए। 2004 में वो राज्यसभा से दूसरी बार सांसद बने और गृह मंत्रालय के अलावा कई कमेटियों के सदस्य रहे। 2009 में वह 7वीं बार सांसद बने और उन्हें शहरी विकास समिति का अध्यक्ष बनाया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें मधेपुरा सीट पर हार का सामना करना पड़ा।
Published on:
15 Dec 2017 05:37 pm
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