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दूसरे के खून से मिलती रही जिंदगी, अब संघर्ष कर दूसरे पीडि़तों के लिए बन रहे सहारा

कोई सोसाइटी बनाकर कर रहे मदद तो किसी को कलेक्टर बनने की ललक, पढि़ए थैलेसीमिया डे पर विशेष

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Special on Thalassemia Day, read full story

शहडोल- दूसरे के खून से जिंदगी का हर दिन मिल रहा है। हर दिन जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करना पड़ता है। इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। संघर्ष किया और गंभीर बीमारी को मात दी। अब दूसरे पीडि़तों के लिए मिशाल साबित हो रहे हैं। हम बात कर रहे है थैलेसीमिया से पीडि़त मरीजों की। कोई थैलेसीमिया पीडि़त दूसरे थैलेसीमिया पीडि़तोंं के लिए वेलफेयर सोसाइटी शुरू कर दी है तो कोई कक्षाओं में अव्वल आकर अफसर बनने के बाद पीडि़तों के लिए काम करना चाहता है।

जिले में थैलेसीमिया पीडि़तों ने बीमारी को तो पीछे पछाड़ दिया लेकिन खुद को सरकार से उपेक्षित मान रहे हैं। कई थैलेसीमिया पीडि़तों का परिवार बीमारी के बाद पूरी तरह टूट चुका है। इलाज में लाखों खर्च हो चुके हंै। फिर भी सरकार से कोई विशेष मदद नहीं मिली। इलाज के लिए अभी भी दूसरे महानगरों की मदद लेनी पड़ रही है।

रायपुर , नागपुर और जबलपुर का सहारा
यहां ब्लड ट्रंासफ्यूजन की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण थैलेसीमिया पीडि़ता का परिवार नागपुर, जबलपुर और रायपुर की मदद लेता है। कोई हर माह ब्लड ट्रंासफ्यूजन के लिए जाता है तो कोई तीन महीने में एक बार। ब्लड कंपोनेट यूनिट बनने से राहत मिलनी चाहिए लेकिन थेलेसीमिया पीडि़तों के लिए न तो वार्ड बनाया गया है और न ही कोई पर्याप्त व्यवस्था है। जिससे लोगों को परेशानी होती है।

वेलफेयर सोसाइटी बनाकर दूसरे की मदद
शहर के पारस जैन को जन्म के 6 माह बाद ही थैलेसीमिया हो गया था। परिवार में अचानक बड़ी विपदा आने से पूरे परिवार पर पहाड़ टूट पड़ा। पारस के पिता ने हिम्मत नहीं हारी और डटे रहे। स्थिति यह है कि पारस अब पहले से ठीक हैं। पारस ने विवाह भी कर लिया है। इतना ही नहीं पारस अब दूसरे थैलेसीमिया पीडि़तों के लिए सहारा बन रहे हैं। पारस ने नेशनल थैलीसीमिया वेलफेयर सोसाइटी बनाई है। इसमें जिलेभर के थैलेसीमिया पीडि़तों के हक और इलाज के लिए आवाज उठाते हैं और पिछले लंबे समय से इस दिशा में काम कर रहे हैं। पूर्व में ब्लड कंपोनेंट यूनिट की भी इन्होने मांग उठाई थी।

जिंदगी रही तो कलेक्टर बन करूंगी मदद
शहर के घरौला मोहल्ला में रहने वाली थैलेसीमिया पीडि़ता भूमिका बहरानी के हौसले काफी बुलंद हैं। भूमिका जन्म के ६ माह बाद से ही थैलीसीमिया से पीडि़त हैं लेकिन हार नहीं मानी। भूमिका कक्षा ९वीं की छात्रा हैं और हर क्लास में अव्वल आती है। भूमिका का कहना है कि जिंदगी रही तो कलेक्टर बनूंगी। सरकारी मदद न मिलने से पापा को दिक्कतें होती हैं लेकिन मैं अफसर बनी तो सबसे पहले थैलेसीमिया पीडि़तों की मदद करूंगी। भूमिका को पहले तीन से चार माह में खून लगता था लेकिन बड़े होने के बाद हफते में खून की जरूरत लगने लगी थी। हालांकि पहले से अब हालत में सुधार है।

इलाज और दवाइयों में टूट जाता है परिवार
अध्यक्ष पारस जैन और भूमिका के पिता दीपक बहरानी सहित दर्जनों थैलीसीमिया पीडि़तों का परिवार सरकार की उपेक्षा का शिकार है। इनकी मानें तो दवाईयों में ही महीने का पूरा पैसा निकल जाता है। दवाईयां न मिलने के कारण दिल्ली से दवाईयां लानी पड़ती हंै। 15 से 20 हजार रूपए हर माह दवाईयों में खर्च हो जाता है। इससे परिवार को आर्थिक संकटों से जूझना पड़ता है।