
This school has completed 50 years
Akhilesh shukla
शहडोल- स्कूल की बात हो, और सरस्वती स्कूल की चर्चा ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। आज के जमाने में जब इंग्लिश मीडियम स्कूलों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ रहा है, ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में डाल रहे हैं। ऐसे समय में भी सरस्वती स्कूल की अपनी एक अलग ही पहचान है। यहां पढऩे वाले छात्रों की कमी नहीं है। बल्कि आज भी इस संस्कारधानी में एडमिशन के लिए छात्रों के बीच भारी कंपटीशन देखा जाता है। यहां से पढ़े हुए छात्र जाने कहां-कहां नहीं है। बड़े-बड़े पदों से लेकर विदेशों में भी अपने देश का नाम रोशन कर रहे हैं। और यही इस स्कूल की खासियत है। जहां से शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को अच्छे संस्कार भी दिए जाते हैं।
इस स्कूल की सफलता का यही सबसे बड़ा कारण भी है। इसी की बदौलत शहडोल का ये सरस्वती शिशु मंदिर अपनी स्थापना के 50 साल पूरे कर चुका है। 50 साल पूर्ण करने के उपलक्ष्य में ही स्वर्ण जयंती महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। ये महोत्सव कई बड़े आयोजनों के साथ 6 और 7 जनवरी को होगा।
ऐसे स्थापित हुआ स्कूल
30 जून 1967 को शाम के वक्त साढ़े आठ बजे के करीब नगर के कुछ समाज सेवी और शिक्षा से जुड़े हुए लोग बुढ़ार रोड स्थित मुकुटधारी शर्मा जी के मकान में इकट्ठे हुए, जहां नगर में एक बाल विद्यालय की स्थापना करना मुख्य मुद्दा था। चर्चा में सभी की सहमति से मुकुटधारी शर्मा अधिवक्ता के शहडोल नगर स्थित मकान के तीन हिस्से को किराये पर ले लिया गया। इस अहम बैठक की कार्रवाई का समय ही शहडोल सरस्वती शिशु मंदिर के जन्म का समय है। इसके बाद से लगातार स्कूल में नए-नए कार्य होते रहे और स्कूल का विकास होता रहा। लोगों के बीच स्कूल ने इतनी तेजी से अपनी पहचान बनाई, कि कक्षाएं बढ़ी, छात्र संख्या बढ़ी और स्कूल के लिए किराए पर लिया गया मकान छोटा पडऩे लगा।
जब जेल बिल्डिंग के सामने शिफ्ट हुआ स्कूल
स्कूल लगातार बढ़ रहा था, कक्षाओं के साथ छात्र संख्या बढ़ रही थी जिसे देखते हुए 15 मई 1968 की बैठक में जेल बिल्डिंग के सामने केशव प्रसाद जी चतुर्वेदी का मकान एक सौ पच्चीस रुपए हर महीने किराये पर लेने का फैसला किया गया। जिसके बाद पूरा स्कूल बढ़ार रोड से जेल बिङ्क्षल्डग के सामने शिफ्ट हो गया। स्कूल पूरी तरह से प्राथमिक स्तर तक पहुंच चुका था।
खुद की जमीन पर ऐसे खड़ा हुआ स्कूल
स्कूल का सम्मान लगातार बढ़ रहा था, और समिति अपनी भूमि पर अपना स्कूल खड़ा करना चाहती थी, और फिर 11 सिंतबर 1970 को को शंकर लाल जी की अध्यक्षता में समिति ने चार एकड़ भूमि स्कूल के लिए खरीदने का फैसला किया। और फिर पांडव नगर में मुडऩा नदी से जुड़ा हुआ एक भूखंड सोहागपुर निवासी भेसमान खां से खरीदा गया।
आगे की कक्षाएं खोलने की मांग बढ़ी और दिनांक 27 जून 1972 को समिति की बैठक में कक्षा 6 और सात खोलने का फैसला किया गया। स्कूल लगातार बढ़ रहा था छात्र संख्या बढ़ रही थी जिसे देखते हुए समिति ने 5 मई 1973 को खुद की जमीन पर स्कूल भवन का शिलान्यास करने का फैसला किया। इस तरह से बुढ़ार रोड से पांडव नगर तक विकास के कई चरण पार करता हुआ सरस्वती शिशु मंदिर आज अपने वर्तमान स्वरूप को हासिल किया। 1983 में ये इस स्कूल में 12वीं तक की कक्षाएं शुरू हो गईं।
वर्तमान में सरस्वती शिशु मंदिर
बदलते वक्त के साथ इस स्कूल में भी लगातार विकास होते रहे। छात्र संख्या लगातार बढ़ती रही, आज इस स्कूल में शहर के अलावा जिले के 35 गांव के बच्चे इस स्कूल में पढ़ाई करने आते हैं ये स्कूल आज 62 कमरों में बदल चुका है। लगातार इस स्कूल के बच्चे नई-नई उंचाइयों को छू रहे हैं।
बुलंदियों को छू रहे स्कूल के छात्र
इस स्कूल से पढने वाले छात्र आज अच्छी-अच्छी जगहों पर हैं। बड़े-बड़े पदों पर कार्य कर रहे हैं, कोई जज है, कोई अफसर है, कोई वैज्ञानिक है, कोई पुलिस में सेवा दे रहा, कोई टीचर है, कोई पत्रकार है, कोई
कलाकार है तो कोई बड़ा बिजनेस मैन है। एक तरह से देखा जाए तो इस स्कूल से निकलने वाले ज्यादातर छात्र आज सफलताओं की सीढिय़ों को छू रहे हैं।
सरस्वती स्कूल से ही पढ़े अरुण कुमार सिंह जज हैं, निवेदिता शुक्ला आईएएस हैं, सौरभ सिंह स्कॉटलैंड में वैज्ञानिक हैं, इनके अलावा भी यहां से निकलने वाले कई ऐसे स्टुडेंट हैं जो बड़ी जगहों पर
कार्य कर रहे हैं, बुलंदियों को छू रहे हैं।
Published on:
04 Jan 2018 05:09 pm
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