
बाबा गरीबनाथ की पावन नगरी अवंतिपुर बड़ोदिया के रहवासियों द्वारा संत शिरोमणि बाबा गरीबनाथ का पुण्य स्मरण किया जाता है।
शुजालपुर. रंगपंचमी पर जहां संपूर्ण क्षेत्र रंग-गुलाल में सराबोर होकर होली मनाने में मशरूफ रहता है, वहीं दूसरी ओर बाबा गरीबनाथ की पावन नगरी अवंतिपुर बड़ोदिया के रहवासियों द्वारा संत शिरोमणि बाबा गरीबनाथ का पुण्य स्मरण किया जाता है। क्षेत्रवासी आयोजन को चमत्कार के रूप में देखते हैं। इसी दिवस से अवंतिपुर बड़ोदिया में मेला शुरू होता है। आयोजन को कई वर्षों से उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।
रंगपंचमी पर बाबा के निर्देशानुसार 9-9 फीट सागौन की लकड़ी के पाटों से निर्मित लगभग 85 फीट के ध्वज को सुबह 10 बजे रस्सियों के सहारे उतारा जाकर शाम 4 बजे चढ़ाया जाता है। ध्वज को उतारने व चढ़ाने का कार्य मात्र अनुभवी व्यक्ति करते हैं, जबकि उत्सव मनाने व ध्वज तैयार करने में जन-जन का सहयोग रहता है। बाबा गरीबनाथ की अपरंपार लीला होने के कारण ही समाधि स्थल पर भक्तों का आना-जाना वर्षभर बना रहता है, लेकिन विशेषकर रंगपंचमी पर आयोजन होने पर जनसमुदाय समाधि स्थल पर नतमस्तक होते हैं। मेला 25 मार्च से प्रारंभ होकर 8 अप्रैल तक चलेगा। आयोजन को लेकर एसडीएम शुजालपुर वीपी सिंह, तहसीलदार सहित अन्य अधिकारियों ने कार्यक्रम स्थल व मेला स्थल का निरीक्षण करते हुए आवश्यक दिशा निर्देश दिए।
यथावत निकलती है सामग्री
ग्रामीणों का कहना है कि संत शिरोमणि की चमत्कार एवं असीम कृपा से सभी की इच्छा, मनोकामनाएं व आशाएं पूर्ण होती हैं। यहां पर महात्मा की समाधि में नमक, पान, नारियल, रुपए पैसे की भेंट चढ़ाते है। जो एक साल बाद पूर्व स्थिति में देखने का मिलता है। उक्त सामग्री को भक्त औषधि के रूप में भी प्रयोग करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार जिन माताओं की गोद सूनी होती है वह संतान प्राप्ति की इच्छापूर्ति के लिए ध्वज पर गाय के गोबर से स्वास्तिक बनाती है। एक वर्ष बाद जब गोद भर जाती है तब स्मृति चिह्न पर बने सातिए को सीधा गाय के गोबर से बनाती और पिंड में श्रद्धसुमन के रूप में नमक, पान, नारियल, रुपए आदि चढ़ाती हैं।
इसलिए मनता है उत्सव
इस आयोजन को लेकर प्रचलित हैै कि बाबा गरीबनाथ का जन्म झांसी उत्तरप्रदेश में एक गोस्वामी परिवार में हुआ था। महात्मा गरीबनाथजी चार भाई थे। आप स्वयं भाइयों को साथ लेकर देशाटन पर निकले। भ्रमण करते अवंतिपुर बड़ोदिया पहुंचे। ग्राम को नेवज नदी के तट पर स्थित व अन्नपूर्णा देवी का मंदिर तथा रमणीय स्थान देखकर बाबा ने कुटिया बना ली और देवीजी की पूजा अर्चना करने लगे। शनै: शनै: महात्मा जी ने अवंतिपुर बड़ोदिया को कर्मभूमि बना लिया और आजीवन रहने का मंसूबा कर लिया। आप पवित्र ग्रामीणों के प्रेम से वशीभूत हो गए। आपने अपनी कला का चमत्कार दिखाना शुरू कर दिया। इससे आप चर्चित हो गए। कहा जाता है कि महात्मा जी ने संवत 1345 में अवंतिपुर बड़ोदिया में जीवित समाधि ली थी। ग्राम अवंतिपुर बड़ोदिया के कुछेक नागरिक गंगा स्नान करने हेतु सौरमजी उत्तरप्रदेश गए। वहां सोरमजी में गंगा नदी के तट पर तीर्थ यात्रियों ने जहां महात्मा जी के प्रत्यक्ष दर्शन किए। तब सभी तीर्थयात्री आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने बाबा को पुन: अवंतिपुर बड़ोदिया चलने का अनुरोध किया परंतु बाबा ने इंकार कर दिया। तीर्थयात्रियों के विशेष अनुनय पर राजी हो गए। कहा जाता है कि गांव के पटेल गोविंदसिंह व गणपतसिंह सहित अन्य ग्रामीण जब बाबा गरीबनाथ को पालकी बैठाकर लश्कर ग्वालियर तक लाए। तब तीर्थयात्री रात्रि विश्राम करने लगे तब महात्माजी अंतर ध्यान हो गए। बाबा को ढूंढने का अथक प्रयास किया परंतु सफलता नहीं मिली। तीर्थयात्री परेशान होकर पालकी के पास पहुंचे। तब पालकी में बाबा गरीबनाथ के कर कमलों द्वारा लिखित पत्र मिला। पत्र में लिखा था मैं आप लोगों की श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न हूं। अब मैं अवंतिपुर बड़ोदिया चलने में असमर्थ हूं्ï। मेरे द्वारा इस लिखित पत्र के अनुसार आप ध्वज तैयार करना और रंगपंचमी के पावन दिवस पर 9-9 हाथ के सागौन की लकडिय़ों के 9 पाटों को जोड़कर उनको गेरू व सफेद रंग से ध्वज के ऊपर मोर, छत्र कलश आदि पूजा-अर्चना करना। प्रात: ध्वज उतारकर सांय 4 बजे रस्सियों के सहारे चढ़ाने का कार्य शुरू करना, तभी से ग्रामवासी यह आयोजन मनाते चले आ रहे हैं।
Published on:
25 Mar 2019 11:00 am
बड़ी खबरें
View Allशाजापुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
