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अब एनआरसी में भर्ती नहीं होंगे कुपोषित बच्चे

कुपोषण नियंत्रण के लिए श्योपुर जिले में लागू होगा यूनीसेफ का नया कार्यक्रम, पायलट प्रोजेक्ट में प्रदेश के 9 जिलों के साथ श्योपुर को किया शामिल, समुदाय आधारित प्रबंधन कार्यक्रम के तहत हर आंगनबाड़ी पर लगेंगे विशेष क्लीनिक, गंभीर कुपोषितों का होगा उपचार

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अब एनआरसी में भर्ती नहीं होंगे कुपोषित बच्चे

श्योपुर,
जिले के लिए नासूर बन चुके कुपोषण पर पार पाने के लिए विभाग ने अब एक और कवायद शुरू की है, जिसमें गंभीर और अति गंभीर कुपोषित बच्चों को उपचार आंगनबाड़ी केंद्रों पर ही किए जाने का एक्शन प्लान बनाया है। इसके लिए हर आंगनबाड़ी केंद्र पर सी-सैम क्लीनिक लगेंगे, जिसमें कुपोषित बच्चों का चिकित्सकी आंकलन और अतिरिक्त पोषण आहार दिया जाएगा। इसके अलावा जटिल बीमारियों वाले अति गंभीर कुपोषित बच्चे ही एनआरसी में भेजे जाएंगे।

ये सब होगा यूनिसेफ और महिला बाल विकास विभाग द्वारा शुरू किए जाने वाले कुपोषित बच्चों के लिए समुदाय आधारित प्रबंधन कार्यक्रम(सी-सेम) के तहत। यूनिसेफ के माध्यम से प्रदेश के 9 जिलों में लागू किए जाने इस कार्यक्रम के पायलट प्रोजेक्ट में श्योपुर जिले को भी शामिल किया गया है। यही वजह है कि पिछले दिनों अन्य जिलों के साथ श्योपुर के भी आधा दर्जन अफसरों को ट्रेनिंग दी गई, जो अब सेक्टर सुपरवाइजर्स व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं को ट्रेनिंग देंगे। उल्लेखनीय है जिले में वर्तमान में 3 हजार से ज्यादा बच्चे अति कुपोषित है।

बताया गया है कि इस सी-सैम कार्यक्रम के तहत आंगनबाड़ी केंद्र पर समुदाय के बीच रखकर ही बच्चों का स्वास्थ्य और पोषण में सुधार किया जाएगा। गंभीर और कुपोषित बच्चों को एनआरसी भेजने की आवश्कता नहीं होगी। बल्कि वे ही बच्चे एनआरसी भेजे जाएंगे, जिनमें कुपोषण के साथ कोई जटिल बीमारी होगी। विशेष बात यह है कि अब बौनेपन को भी कुपोषण की श्रेणी में लिया गया है। जिसके तहत बच्चे की उम्र के हिसाब से उसकी लंबाई नहीं बढ़ रही है तो तय है कि उसे सही पोषण नहीं मिल रहा है। ऐसे बच्चों को एनआरसी में भेजा जाएगा।

पहले सभी बच्चों की होगी स्क्रीनिंग, फिर उपचार
बताया गया है कि इस नए प्रोजेक्ट में आंगनबाड़ी केंद्रों पर महिला बाल विकास विभाग का अंमला बच्चों की स्क्रीनिंग करेगा, जिसमें कुपोषित और अति गंभीर कुपोषित बच्चे चिन्हित किए जाएंगे। विशेष बात यह है कि अब बच्चे की बाजू माप से नहीं बल्कि बच्चे की उम्र के आधार पर वजन, लंबाई और ऊंचाई मापकर कुपोषित बच्चे चिन्हित होंगे। इसके लिए आंगनबाड़ी केंद्रों में भी इन्फेंटोमीटर व स्टेडियोमीटर दिए जाएंगे। इसके बाद चिन्हित बच्चों का चिकित्सकीय आंकलन किया जाएगा, जिसमें बच्चे को एनआरसी भेजना है या समुदाय में ही रखकर प्रबंधन करने की स्थिति देखी जाएगी। इसके बाद 12 हफ्ते आंगनबाड़ी केंद्र में ही क्लीनिक एवं सी-सेम सत्रों व विशेष फॉलोअप के द्वारा बच्चों की निगरानी की जाएगी। सी-सेम में चिंहित बच्चों को टीएवआर की अतिरिक्त मात्रा प्रदाय की जाएगी व घर में ही इसकी निगरानी की व्यवस्था की जाएगी। यदि किसी बच्चें का वजन लगातर दो सप्ताह तक स्थिर रहता है या कम होता है, तो उसे तत्काल एनआरसी रैफर किया जाएगा। वहीं एएनएम द्वारा प्रति माह सी-सेम क्लीनिक में इन बच्चों का लगातार तीन माह तक परीक्षण किया जाएगा।

ये लेकर आए ट्रेनिंग
यूनिसेफ के इस 9 जिलों के पायलट प्रोजेक्ट में श्योपुर जिले के छह लोगों को बीते रोज ट्रेनिंग दी गई। जिसमें आरबीएसके के डॉ.राजेश मेहरा के साथ महिला बाल विकास विभाग के सीडीपीओ देवेंद्र साहू और रॉय व तीन सुपरवाइजर सुषमा सोनी, रजनी कुशवाह और मीनू मगरैया शामिल है। अब ये छह लोग श्योपुर जिले में सुपरवाइजर व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को इस प्रोजेक्ट के बारे में टेंड करेंगे।


वर्जन
यूनिसेफ के माध्यम से सी-सेम प्रोजेक्ट प्रदेश के 9 जिलों में लागू किया जा रहा है, जिसमें श्योपुर जिला भी शामिल है। इसके लिए श्योपुर से छह लोगों की ट्रेनिंग हो गई है, जल्द ही जिलास्तर पर भी ट्रेनिंग करवाएंगे।
रतन सिंह गुंडिया
डीपीओ, महिला बाल विकास श्योपुर


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