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विकास की राहों में सांसें लेना हुआ मुश्किल,जानिए इस जिले की समस्या

बढ़ती आबादी, उपभोक्तावादी जीवन शैली, शहरीकरण, विकास के नाम पर मिट्टी के खनन के कारण हर वर्ष दो प्रतिशत तक हरियाली घट जाती है।

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सीकर. बढ़ती आबादी, उपभोक्तावादी जीवन शैली, शहरीकरण, विकास के नाम पर मिट्टी के खनन के कारण हर वर्ष दो प्रतिशत तक हरियाली घट जाती है। समय रहते जिम्मेदारों ने ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिनों में भयावह हालात हो जाएंगे। जिले का औसत तापमान बढऩे के कारण पिछले छह वर्षों मेंं कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि हो रही है। जिले में सडक़ों का नेटवर्क तो मजबूत हो रहा है, लेकिन इन सडक़ों से गुजरने वाले को छाया नसीब नहीं होती। जिले का औसत तापमान बढऩे के कारण पिछले छह वर्षों मेंं कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि हो रही है।

चिंता की तस्वीर बताते आंकड़े

वर्ष 1988 में 33 प्रतिशत भू-भाग को वनों से आच्छादित करने की नीति बनाई थी, लेकिन परिणाम ठीक नहीं आए, प्रदेश में 13.50 प्रतिशत वनभूमि थी जो घटकर 9 प्रतिशत रह गई है। वनों की सघनता 0.8 से घटकर 0.2 रह गई है। प्रदेश में 37 हजार वर्ग कि.मी. वन भूमि थी जो घटकर 31 हजार वर्ग किमी ही रह गई है। यह है कारण सीकर जिले में 17 मई 1991 से 16 मई 2016 की 25 वर्ष की अवधि में तापमान में हुए परिवर्तनों सामने आ रहे हैं।

मौसम विभाग के अनुसार सीकर जिले में 1991 में औसत तापमान न्यूनतम 27.22 और अधिकतम 49.19 डिग्री सेल्सियस था, वह 2016 में बढकऱ न्यूनतम 29.85 से अधिकतम 53.34 डिग्री हो गया। इस प्रकार तापमान में लगभग 2.6 से 4.1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। जिले में इस अवधि में तापमान में वृद्धि 3.0 से 4.5 डिग्री की हुई है।

25 वर्ष में एक चौथाई उपजाऊ मिट्टी खत्म

पर्यावरण विदों ने बताया कि मिट्टी की ऊपरी बीस सेंटीमीटर मोटी परत ही हमारे जीने का आधार है। यदि यह जीवनदायी परत नष्ट हो गई तो उत्पादन गिर जाएगा। प्रत्येक एक मिनट में राज्य में 23 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बंजर में बदल जाती है। इस कारण हर साल खाद्यान्न उत्पादन में कमी आ रही है। भूमि की पच्चीस सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की ऊपरी परत के बनने में दो सौ से एक हजार साल का समय लगता है। जिले में गहन खेती के कारण 1980 से अब तक धरती की एक-चौथाई उपजाऊ भूमि नष्ट हो चुकी है। इसी को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 2010-2020 को मरुस्थलीकरण विरोधी दशक के रूप में मनाया जा रहा है।