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Rajasthan Politics: सचिन पायलट और अशोक गहलोत दोनों को ऑक्सीजन दे रहे ये दिग्गज

Rajasthan Politics: पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीट देने वाली सीकर कांग्रेस इस बार सियासी संग्राम की वजह से दो धड़ों में बंटी हुई है।

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सीकर

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Santosh Trivedi

May 18, 2023

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rajasthan politics : पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीट देने वाली सीकर कांग्रेस इस बार सियासी संग्राम की वजह से दो धड़ों में बंटी हुई है। पिछले दिनों कांग्रेस सह प्रभारी के सामने भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं की नाराजगी के तेवर सामने आ चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा का सीकर गृह जिला है। कांग्रेस को यहां से बेहतर परिणाम की भी आस है। लेकिन उनकी राह में भी बिखराव बढ़ी चुनौती है। कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस दिग्गजों को भी एकजुट रखना कांग्रेस के लिए चुनावी साल में बड़ी चुनौती है।

पिछले दिनों पूर्व डिप्टी सीएम की यात्रा को भी सीकर के दिग्गज नेताओं ने जमकर ऑक्सीजन दी। दूसरी तरफ गहलोत गुट के पक्ष में भी यहां के दिग्गजों की तरफ लगातार बयान दिए जा रहे हैं। इस वजह से यहां के कायकर्ता भी कई विधानसभा क्षेत्रों में दो धड़ों में बंटे हुए हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष व लक्ष्मणगढ़ विधायक गोविन्द सिंह डोटासरा, फतेहपुर विधायक हाकिम अली, सीकर विधायक राजेन्द्र पारीक, खंडेला विधायक महादेव सिंह सहित अन्य दिग्गज लगातार सरकार के बचाव में जुटे हैं। दूसरी तरफ श्रीमाधोपुर विधायक दीपेन्द्र सिंह लगातार गहलोत सरकार को निशाने पर ले रहे है।

पिछले दिनों गहलोत गुट पर किए सियासी हमले को लेकर सियासी गलियारों में कई तरह की चर्चाएं रही। सियासी संग्राम के समय नीमकाथाना विधायक सुरेश मोदी भी सरकार के कामकाज पर अंगुली उठा चुके है। दूसरी तरफ पड़ौसी झुंझुनूं जिले के विधायक व मंत्री राजेन्द्र गुढ़ा पिछले साढ़े चार साल में कई बार सरकार को घेर चुके हैं। गुढ़ा के कई बयान सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा में है।

खास बात यह है कि लगातार गुटों में बंटती कांग्रेस ने भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों की राहें थोड़ी आसान कर दी है। सूत्रों की माने तो पायलट के कार्यक्रम में कई विधानसभा क्षेत्रों के दावेदार व दो हजार से अधिक कार्यकर्ताओं ने ताकत दिखाई। पायलट की पदयात्रा में रामदेव सिंह, वेदप्रकाश राय, सुरेश गुर्जर सहित 20 से अधिक वरिष्ठों व्यस्थाओं का जिम्मा भी संभाला।

गृह जिले में एकजुटता बनाए रखना चुनौती
एकजुटता के मामले में पीसीसी अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा को खुद अपने घर से भी कड़ी चुनौती मिल रही है। पीसीसी में मीडिया से रूबरू होते हुए अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा कह चुके है कि पायलट की यात्रा संगठन की यात्रा नहीं है। इसके बाद भी सीकर जिले के वरिष्ठ नेताओं के साथ कार्यकर्ताओं का वहां जाकर मोर्चा संभाला। इसका असर आगामी चुनाव की तैयारियों को भी प्रभावित करेगा। वहीं पीसीसी अध्यक्ष के जिले की दो विधानसभा क्षेत्रों की परफोरमेंस को खुद संगठन ने कमजोर माना है।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नारायण सिंह
पायलट की पदयात्रा में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नारायण सिंह के जाने को लेकर सियासी हल्कों में गर्माहट है। शेखावाटी सहित कई जिलों में कांग्रेस को खड़ी करने में भी नारायण सिंह की अहम भूमिका रही है। सचिन पायलट के प्रदेश अध्यक्ष बनने से लेकर अब तक नारायण सिंह अब तक साथ है। पिछले दिनों वीरेन्द्र सिंह ने भी कहा था कि जो लोग बूथ पर चुनाव नहीं जीत सकते उनको नियुक्ति देना कितना सही है। ऐसे में बिना एकजुटता कांग्रेस की चुनौती बढ़ना तय है।

दीपेन्द्र सिंह शेखावत
गहलोत के पिछले कार्यकाल में दीपेन्द्र सिंह शेखावत को विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी। इस बार के विधानसभा चुवाव के समय से ही गहलोत गुट से शेखावत का मोहभंग हो गया था। मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने पर यह दूरियां और बढ़ गई। सचिन पायलट की पदयात्रा के समय शेखावत ने कहा कि राम के पास सिर्फ वानरों की सेना थी, लेकिन धर्म युद्ध में जीत भगवान राम की ही हुई थी। उन्होंने कई मुद्दों को लेकर सरकार को जमकर निशाने पर भी लिया।

दावेदारों की फौज

महंगाई राहत शिविर सहित अन्य कार्यक्रमों में कांग्रेस के दावेदार भी सामने आने लग गए है। पिछले चुनाव में खंडेला में बिगडे़ कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि निर्दलीय विधायक ने गहलोत गुट को सबसे पहले समर्थन दे दिया था। इसी तरह जिले की चार विधानसभाओं में भी कांग्रेस के नए दावेदार दोनों गुटों से सामने आ रहे हैं। ऐसे में टिकट वितरण के बाद ड्रेमेज करना बड़ी चुनौती है।

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कार्यकर्ताओं में नाराजगी:
सीकर जिले के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से सरकार के कामकाज को लेकर अंगुली उठाई जा रही है। कार्यकर्ताओं का सवाल है कि जिस जिले ने कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीट दी क्या उस जिले में एक भी कार्यकर्ता योग्य नहीं था क्या कार्यकर्ताओं की ओर से साढ़े चार साल से यूआइटी की खाली कुर्सी को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।