
सीकर जिले में बढ़ती गर्मी के साथ आवारा श्वानों का आक्रामक व्यवहार लोगों के लिए खतरा बनता जा रहा है। सबसे ज्यादा हमलों का शिकार पांच साल से अधिक उम्र के बच्चे हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में प्रतिदिन पांच से ज्यादा नए डॉग बाइट के मामले पहुंच रहे हैं। अप्रैल माह में जिलेभर में 127 बच्चे श्वान हमले का शिकार हुए, जिनमें सबसे ज्यादा मामले शहरी क्षेत्र से सामने आए हैं। चिकित्सकों के अनुसार तेज गर्मी में श्वानों का स्वभाव चिड़चिड़ा और आक्रामक हो जाता है। पानी और भोजन की कमी, शरीर का तापमान बढ़ना और झुंड में घूमना हमलों की बड़ी वजह बन रहा है। दूसरी ओर नगर परिषद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नसबंदी अभियान चलाने का दावा कर रही है, लेकिन शहर और कस्बों में आवारा श्वानों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
जिला मुख्यालय पर अंदरूनी शहरी क्षेत्र में डॉग बाइट के मामले तेजी से बढ़े हैं। गली मोहल्लों में खेलने वाले बालक सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में सुबह और शाम के समय श्वानों के झुंड राहगीरों का पीछा कर रहे हैं। ओपीडी से जुटाए आंकड़ों के अनुसार सालासर स्टैंड, देवीपुरा, स्टेशन रोड, सोमनाथ त्रिहन की गली, तबेला बाजार, नवलगढ़ रोड, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन के पास जैसे कई क्षेत्रों के मरीज आ रहे हैं। कल्याण अस्पताल के इंजेक्शन रूम और ट्रोमा यूनिट में एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने आने वालों की संख्या भी बढ़ गई है। श्वान के हमलों से प्रभावित मरीजों में शामिल बच्चों बच्चों में डर और मानसिक तनाव की स्थिति भी देखने को मिल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार गर्मी का असर सीधे श्वानों के व्यवहार पर पड़ता है। इनमें तेज तापमान से शरीर में तनाव बढ़ना, पानी और छांव की कमी, भोजन नहीं मिलने से चिड़चिड़ापन, भीड़भाड़ और शोर से उत्तेजना, पत्थर मारना या छेड़ना, नसबंदी नहीं होने से बढ़ रही समस्या पशु चिकित्सकों के अनुसार समय पर नसबंदी नहीं होने से निराश्रित श्वानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक मादा श्वान साल में कई बच्चों को जन्म देती है, जिससे कुछ वर्षों में संख्या कई गुना बढ़ जाती है। हालांकि नगर परिषद की ओर से शहर में अभियान चलाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन कई वार्डों में अब भी बड़ी संख्या में आवारा श्वान खुले घूम रहे हैं।
चिकित्सकों के अनुसार श्वान के काटने के बाद घाव को 10 से 15 मिनट तक साबुन और पानी से धोएं। तुरंत अस्पताल जाकर एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाएं। घाव पर मिट्टी, तेल या मिर्च नहीं लगाएं। छोटे बच्चों को अकेले बाहर नहीं भेजें। श्वानों को छेड़ने से बचें
गर्मी के मौसम में कुत्तों के शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर भी बढ़ जाता है। यह हार्मोन तनाव और गुस्से को बढ़ाने का काम करता है. इसके अलावा भोजन और पानी की कमी भी कुत्तों को आक्रामक बना देती है। गर्मी में अक्सर आवारा कुत्तों को पर्याप्त खाना और ठंडा पानी नहीं मिल पाता, जिससे उनका व्यवहार बदलने लगता है। इंसानों की तरह से कुत्तों की गर्मी पसीने की तरह से नहीं निकलती है। मुंह के रास्ते ली जाने वाली सांस से वो अपने शरीर की गर्मी को मेंटेन करते हैं। जब गर्मी बहुत बढ़ जाती है तो ऐसा करने में उन्हें बहुत तकलीफ होती है। इसके चलते उनके अंदर चिढ़-चिढ़ापन आ जाता है। इसके अलावा आसपास घने पेड़ न होने के चलते निराश्रित श्वानों को छांव भी नहीं मिल पाती है। घर के आसपास ठंडी जगह में लोग उन्हें बैठने नहीं देते हैं।
गर्मी बढ़ने के साथ डॉग बाइट के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। अस्पताल में अप्रेल माह में 127 बच्चे श्वान के काटने के आए हैं। रोजाना पांच से छह केस डॉग बाइट के आ रहे हैं। समय पर वैक्सीनेशन और नसबंदी अभियान प्रभावी तरीके से चलाना जरूरी है। डॉ. शीबा सेठी, नोडल अधिकारी, एंटी रेबीज क्लीनिक
Published on:
20 May 2026 01:13 pm
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