
दर्दभरी दास्तां: मां ने मजदूरी कर बेटे को पाला, सोचा बुढ़ापे में सहारा बनेगा, लेकिन नियति ने ऐसा खेल खेला की दो वक्त की रोटी भी नहीं
प्रभाष नारनौलिया, लक्ष्मणगढ़.
उपखंड के बठोठ गांव में दलित परिवार के बाबूलाल के साथ नियति अजीब और क्रूर खेल खेल रही है। बचपन में पिता का साया उठ गया। मां छोटी देवी ने मजदूरी कर किसी तरह उसे पाला। मां चाहकर भी उसे पढ़ा नहीं सकी। युवा होते ही बाबूलाल भी मनरेगा में मजदूरी कर किसी तरह परिवार चलाने लगा, लेकिन रहस्यमयी और गंभीर बीमारी के कारण बाबूलाल का हाथ कमजोर, पतला और काला पड़ गया। हाथ की मांसपेशियों ने काम करना बंद कर दिया। ऐसे मे बाबूलाल मजदूरी करने में सक्षम नहीं रहा।
बीपीएल कार्ड धारक बाबूलाल के हाथों के फिंगर-प्रिंट पोश मशीन में न आने के कारण उसके परिवार को मिलने वाली खाद्य सुरक्षा भी बंद हो गई। स्थानीय चिकित्सकों ने बड़ी बीमारी बताकर हाथ खड़े कर दिए हैं और बड़े शहरों में अच्छे चिकित्सकों से इलाज करवाने में परिवार सक्षम नहीं है। कुल मिलाकर अब बाबूलाल और उसकी बूढ़ी मां के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है।
पांच माह पहले हुई बीमारी
करीब पांच माह पहले बाबूलाल को अजीब बीमारी हो गई। उसके दोनों हाथों में शिथिलता आने लगी। एक हाथ तो पंगु होकर पतला और काला पड़ गया। दोनों हाथों में असहनीय दर्द भी शुरू हो गया। 70 वर्षीय मां भी मजदूरी करने लायक नहीं रही। बाबूलाल ने बताया कि उसने सीकर के डॉक्टरों से जांच करवाई थी लेकिन उन्होंने इसका इलाज जयपुर में ही होने की बात कही। हालांकि परिवार का भामाशाह कार्ड है, लेकिन फिंगर प्रिंट के अभाव मे सरकारी अस्पतालों में वह भी काम नहीं आ रहा है। अब जिस परिवार के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ ही ना हो वह जयपुर जैसे शहर मे निजी अस्पतालों मे महंगा इलाज कहां से करवाए, यही सोचकर दोनों मां-बेटे निराश हैं। हालांकि अभी भी बाबूलाल को उम्मीद है कि कोई सरकारी नुमाईन्दा या सामाजिक संगठन दुख की इस घड़ी मे परिवार के लिए संकटमोचक बनकर सामने आएंगे।
Published on:
28 May 2018 09:09 am
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