
सिंगरौली। कोदो व कुटकी अब न केवल शहर के होटलों में शुगर फ्री राइस के रूप में परोसा जाएगा। बल्कि स्कूल में बच्चों को मध्याह्न भोजन के साथ लड्डू, बर्फी व बिस्कुट के रूप में खाने को मिलेगा। जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई योजना कुछ ऐसी ही है। जिले में कोदो-कुटकी की खेती करने वाले किसानों के लिए यह राहत भरी खबर है, क्योंकि इस योजना के क्रियान्वयन के बाद उनके उत्पाद को हाथों-हाथ लिया जाएगा।
कृषि विभाग द्वारा कोदो व कुटकी को एक जिला एक उत्पाद के रूप में लिया गया है। इस बार बोवनी का रकबा बढ़ाने और बेहतर उत्पादन प्राप्त होने के मद्देनजर जिले में खाद्य प्रसंस्करण इकाई शुरू करने की तैयार की गई है। इकाई का संचालन के लिए कंपनियों के सीएसआर मद से बजट लिया जाएगा। हाल में आयोजित एक बैठक में लिए गए निर्णय के मुताबिक कलेक्टर के निर्देश पर खर्च का आकलन किया जा रहा है। खाद्य प्रसंस्करण के जरिए कोदो-कुटकी विभिन्न रूपों में न केवल बाहर के बल्कि स्थानीय स्तर पर भी बाजारों में उपलब्ध कराया जाएगा। गौरतलब है कि अभी तक यहां के किसानों द्वारा उत्पादित कोदो-कुटकी एक फर्म द्वारा मुंबई, नागपुर और वाराणसी के बाजारों तक पहुंचाया जाता था, लेकिन अब स्थानीय बाजारों में भी इसके लिए जगह बनाई जाएगी।
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कृषि विभाग को सौंपा जाएगा जिम्मा
प्रशासन की ओर से अब तक की गई तैयारी के मुताबिक खाद्य प्रसंस्करण का जिम्मा कृषि विभाग को सौंपा गया है। हालांकि इसमें ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से महिला समूहों की भी मदद ली जाएगी। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का मौका मिलेगा। खाद्य प्रसंस्करण इकाई में महिला समूह द्वारा कोदो-कुटकी की सफाई, इससे लड्डू, बर्फी व बिस्कुट जैसी अन्य खाद्य सामग्री तैयार की जाएगी।
करीब दोगुना हुआ बोवनी का रकबा
कोदो व कुटकी का उत्पादन बढ़ने के लिए इस बार कृषि विभाग ने बोवनी का रकबा करीब दो गुना किया है। पूर्व में जहां इस फसल की बोवनी 6 हजार हेक्टेयर में होती रही है। वहीं बीते फसल में बोवनी का रकबा 11 हजार हेक्टेयर से अधिक रहा है। दोनों फसल मिलाकर इस बार 5 हजार क्विंटल से अधिक उत्पादन प्राप्त किया गया है। अधिकारियों के मुताबिक यह खेती पूरी तरह से जैविक विधि से की गई है।
जल्द ही इकाई की स्थापना की जाएगी
एक जिला एक उत्पाद में शामिल कोदो व कुटकी के खाद्य प्रसंस्करण का निर्णय लिया गया है। जल्द ही इसके लिए एक इकाई की स्थापना की जाएगी। कृषि विभाग के अलावा आजीविका मिशन को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। इकाई ऐसे जगह संचालित होगी, जहां तीनों विखं के किसानों व महिला समूहों के लिए सुविधाजनक होगा।
-अरूण कुमार परमार, कलेक्टर सिंगरौली
क्या है मिलेट्स और कितना फायदेमंद (Millets Benefits in Hindi)
मोटे अनाज की चर्चा दुनियाभर में हो रही है। इसे बेहद लाभदायक माना जाता है। मिलेट्स मोटे अनाज को कहा जाता है। इसमें ज्वार, बाजरा, रागी, झंगोरा, बैरी, कंगनी, कुटकी, कोदो, चेना, सामा या सांवा और जौ आदि आते हैं। इसके प्रचार के लिए अब सरकार भी जोरशोर से जुट गई है। यहां तक के भारत सरकार के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को ही मिलेट्स वर्ष घोषित किया है। हालांकि यह मिलेट्स सदियों से भारत में पाया जाता है, लेकिन 60 के दशक में उसका उत्पादन कम हो गया था और हमारी थाली में गेहूं और चावल आने के बाद इसके प्रति रुझान कम हो गया था। 1960 में हरित क्रांति के नाम पर भारत के परंपरागत भोजन को हटा दिया था। गेहूं भी एक प्रकार का मैदा है, जिसे बढ़ावा दिया गया था। मोटा अनाज खाना बंद हो जाने से लोगों को कई प्रकार के रोग और कुपोषण भी देखने को मिलने लगा था। इसकी खासबात यह है कि यह कम पाी में ज्यादा अच्छी फसल उगाता है।
Updated on:
13 Feb 2023 06:05 pm
Published on:
13 Feb 2023 06:03 pm
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