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… तो आठ साल में राखड़ के पहाड़ के नीचे दब जाएगा सिंगरौली

बड़ा सवाल: 20 किमी. की दूरी में कैसे बदल गई पानी की तासीर!

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Singrauli will be buried under the mountain of retreat in eight years

Singrauli will be buried under the mountain of retreat in eight years

सिंगरौली. प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अनुसार जिले में बिजली इकाइयां प्रतिदिन 38 हजार टन राखड़ उत्सर्जित कर रही हैं। इसमें राखड़ डिस्पोज का औसत अधिकतम 40 प्रतिशत है। यानी प्रतिदिन लगगभ 23 हजार टन और सालभर में 84 लाख टन से ज्यादा राखड़ का पहाड़ निर्मित होगा। बिजली उत्पादन इकाइयां राखड़ भरने के लिए डैम के मेढ़ की उंचाई लगातार बढ़ा रही हैं। इससे भी भविष्य में खतरा हो सकता है। जानकारों का कहना है कि राखड़ भंडारण की स्थिति यही रही तो 8 साल में सिंगरौली राखड़ के पहाड़ में दब जाएगा।

रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई करेंगे
सिंगरौली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के इइ एचडी बाल्मीकि ने कहा कि सिंगरौली में औद्योगिक इकाइयों से होने वाले प्रदूषण और उससे मानव स्वास्थ्य पर पढऩे वाले नुकसान के लिए एनजीटी ने केंद्र और राज्य स्तर की अलग अलग दो कमेटियां गठित की हं। इन कमेटियों द्वारा प्रभाव का आकलन करने तकनीकी सलाह और जांच करवाई जा रही है। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई करेंगे। राख डिस्पोज करने एनसीएल के ब्लॉक बी परियोजना के गोरबी में भरने की बात चल रही है।

पानी में आर्सेनिक और लेड का प्रभाव
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी मानते हैं कि यूपी वाले हिस्से यानी शक्तिनगर व सोनभद्र जिले के रिहंद डेम से लगे क्षेत्र रेणुकोट व आसपास पानी भूजल में मरकरी, आर्सेनिक और लेड का प्रभाव है। लेकिन मध्यप्रदेश वाला हिस्सा यानी विंध्यनगर, बैढऩ व सिंगरौली के पानी ऐसा नहीं है। दोनों ही स्थानों की दूरी 20 किलोमीटर है। भूजल का बड़ा स्रोत दोनों ही क्षेत्र में रिहंद का डेम ही है। ऐसे में सवाल उठता है कि यूपी वाले हिस्से का पानी नुकसानदायक है तो एमपी वाले हिस्से का पानी कैसे नहीं रहेगा।