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Rajasthan: 9 साल की देवांशी 18 जनवरी को सूरत में लेगी दीक्षा, रात्रि भोजन त्यागा

सिरोही के मालगांव की 9 साल की बालिका देवांशी धनेश संघवी खेलने की उम्र में साधना के मार्ग पर चलेगी। वह आचार्य विजय कीर्तियशसूरि की निश्रा में 18 जनवरी को सूरत में सुबह 7 बजे संयम जीवन अंगीकार करेगी।

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9 Year Old Devanshi Sanghvi Will Take Initiation In Surat

सिरोही। जिले के मालगांव की 9 साल की बालिका देवांशी धनेश संघवी खेलने की उम्र में साधना के मार्ग पर चलेगी। वह आचार्य विजय कीर्तियशसूरि की निश्रा में 18 जनवरी को सूरत में सुबह 7 बजे संयम जीवन अंगीकार करेगी। दीक्षा महोत्सव 14 जनवरी को शुरू होगा। 17 जनवरी को वर्षीदान का वरघोड़ा होगा, 18 जनवरी को सुबह 6 बजे देवांशी दीक्षा मंडप में प्रवेश करेगी। सुबह 6:30 बजे अंतिम विदाई तिलक होगा, 7 बजे से दीक्षा विधि शुरू होगी। इस बालिका ने साध्वी प्रशमिता से वैराग्य की शिक्षा ग्रहण की है। उसकी दीक्षा लेने की इच्छा को साध्वी चारूदर्शना ने मजबूत बनाया। देवांशी संघवी भेरूतारक तीर्थ धाम के संस्थापक संघवी भेरमल हकमाजी के परिवार के संघवी मोहन भाई की पौत्री व संघवी धनेश-अमी बेन की पुत्री है।

कई भाषाएं जानती है, टीवी नहीं देखती
देवांशी ने 8 वर्ष तक की आयु में 357 दीक्षा दर्शन, 500 किमी पैदल विहार, तीर्थों की यात्रा व जैन ग्रन्थों का वाचन कर तत्व ज्ञान को समझा। देवांशी के माता-पिता अमी बेन धनेश भाई संघवी ने बताया कि बालिका ने कभी टीवी नहीं देखा। देवांशी ने क्विज में गोल्ड मेडल जीता था। संगीत में सभी राग में गाना, स्केंटिग भरतनाट्यम, योगा सीखा। देवांशी संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मारवाड़ी व अंग्रेजी भाषाएं जानती है।

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चार वर्ष की उम्र से गुरु भगवंतों के साथ
देवांशी ने 4 वर्ष 3 माह की उम्र में हर महीने 10 दिन गुरु भगवंतों के साथ रहना शुरू किया। उस समय 37 दीक्षा, 13 बड़ी दीक्षा, 4 आचार्य पदवी में 250 साधु-साध्वी भगवंतों का गुरु पूजन किया। 4 वर्ष 5 माह में कर्मग्रन्थ व ह्रदय प्रदीप ग्रन्थ का वाचन शुरू किया। 5 वर्ष की आयु में दीक्षा विधि कंठस्थ की, 5 वर्ष 8 माह की आयु में आराधना शुरू की। 5 वर्ष 4 माह की आयु में एक ही दिन में 8 सामायिक, 2 प्रतिक्रमण व एकासणा शुरू किया और 7 वर्ष की आयु में पौषध व्रत शुरू किया।

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रात्रि भोजन त्यागा
इस बालिका का जन्म होने पर नवकार महामंत्र का श्रवण कराने के साथ ओगे का दर्शन कराया गया था। बालिका महज 25 दिन की थी, तब नवकारशी का पच्चखाण लेना शुरू किया। जब 4 माह की हुई तो रात्रि भोजन का त्याग शुरू किया। जब 8 माह की थी तो रोज त्रिकाल पूजन की शुरुआत की। एक वर्ष की होने पर रोजाना नवकार मंत्र का जाप शुरू कर दिया। एक वर्ष 3 माह में 58 दिन की आयु में दीक्षा स्वीकार दर्शन किए।