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अभावों में बचपन बीता, नंगे पांव स्कूल गई और जब वर्दी पहन पहली बार गांव आईं तो ग्रामीणों ने पलकों पर बिठा दिया

महिला दिवस विशेष : सिरोही के मुदरला गांव की पहली महिला कांस्टेबल सुमन गरासिया की कहानी...

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महेश परबत/ सिरोही. महिला दिवस पर एक ऐसे गांव की एक महिला की सच्ची कहानी बता रहे हैं जहां एक जमाने में महिलाओं को पंाचवीं तक की तालीम के बाद चूल्हे-चौके के कामों तक ही सिमटा दिया जाता था लेकिन गांव की सुमन गरासिया ने ऐसी मिसाल पेश कि गांव वाले बेटियों को उच्च शिक्षा देने के लिए आगे आने लगे हैं।
सुमन मुदरला गांव की एक ऐसी महिला है जिनके मां-बाप अनपढ़। परिवार में दो छोटे भाई और एक बहन है। माता बदी देवी और पिता मंछाराम मजदूरी कर परिवार पालते और सुमन छोटे भाई-बहनों को संभालती और जब मां घर आती तो वह स्कूल पढऩे को जाती। बकौल सुमन गरासिया, 'पढऩे के लिए दो किलोमीटर दूर आमथला गांव के सरकारी स्कूल में जाती थी। वह भी नंगे पांव। तपती जमीन और गर्मी में पेड़ों की ओट में छांव का सहारा भी लेती लेकिन हिम्मत नहीं हारी। एक समय ऐसा भी आया जब गांव के लोगों ने मेरे परिजनों को मुझे स्कूल छुड़वाने को कहा लेकिन परिजनों ने किसी की नहीं सुनी और मुझे पढ़ाते रहे। उच्च शिक्षा के लिए आबूरोड से पढ़ाई जारी रखी।
गांव की किरण बेदी आ रही है...
जैसा कि सुमन बताती हैं कि वह दिन उसके जेहन में आज भी ताजा है। कुछ साल पहले जब वह पहली बार पुलिस की वर्दी पहन कर गांव आई थी। 'ग्रामीणों को यकीन ही नहीं हुआ कि मैं ही सुमन गरासिया हूं। जैसे-जैसे गांव में यह बात फैली मेरे घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। आज भी यदा-कदा गांव में वर्दी पहनकर जाती हूं तो सभी लोग मिलने आते हैं। गांव वालों को मिलने आते देख खुशी होती है और अच्छा लगता है। आजकल टीवी देखने के बाद मेरे पिता भी गर्व से कहते हैं- देखो गांव की किरण बेदी (सुमन) आ रही है।
अब गांव वाले पढ़ा रहे बेटियों को
वर्तमान में सुमन पिण्डवाड़ा में यातायात पुलिस में तैनात है। कांस्टेबल बनने के बाद गांव का माहौल ही बदल गया। शादी के बाद भी दोहरी भूमिका बखूबी निभा रही है। घर और नौकरी में बेहतर सामंजस्य है। पुलिस खेलकूद में तीरंदाजी की राज्य स्पद्र्धा में जिले के लिए स्वर्ण पदक जीत चुकी है। जैसा कि सुमन कहती है, 'जिस गांव में अकेली लड़की दूर तक पढऩे जाती थी और मुझे वर्दी में देखकर घर-घर में बेटियों को पढ़ाने के लिए लोग आगे आने लगे हैं। मेरे गांव ही नहीं, आसपास की आदिवासी बेल्ट में भी बेटियां जागरूक हो रही हैं और अनपढ़ माता-पिता भी बेेटियों को शिक्षा दे रहे हैं।Ó