
Sirohi: मौसम गर्मी का हो या हाड़कंपाती सर्दी का असर, फटे पुराने कपड़े पहने कंधे पर एक गमछा लिए सूरज उगने से पहले ही चौराहे पर आकर खड़े हो जाना एक मजदूर की मानों दिनचर्या बन गई है। मजदूरी मिलने के इंतजार में टकटकी लगाए कई बार तो पूरा दिन ही बीत जाता है। सिरोही जिले के आबूरोड में यह व्यथा मजदूरी कर कुछ पैसों के जुगाड़ में घंटों हाडतोड़ मेहनत कर अपने व परिवार की भूख शांत करने को दैनिक वेतन पर काम करने वाले मजदूरों की है। जिनकी अपनी जिंदगी लोगों के महल बनाते-बनाते गुजर जाती है, अपना आशियाना बनाने के सपने उनके धरे ही रह जाते हैं। दिहाड़ी पर अपना व परिवार का ही गुजर बसर करना उनकी नियति बन गई है। काम मिलने पर ही घर का चूल्हा जलता है।
चिलचिलाती धूप में हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी दो जून की रोटी का जुगाड़ करना गंभीर समस्या बन गई है। पेट की क्षुधा शांत करने को काम मिल गया तो घर में चूल्हा जलेगा अन्यथा भूखे पेट ही रात को आसमान के तारे गिनने को मजबूर होना पड़ता है। बढ़ती महंगाई ने तो मजदूर की जैसे कमर ही तोड़ दी है।
भूखे पेट धनाढ्य परिवारों के घरों, होटलों, रेस्तराओं, ढाबों, कारखानों, चाय की दुकानों, खेतों में पसीना बहाकर पर्याप्त मेहनताना नसीब नहीं होने से श्रमिकों का शोषण बढ़ रहा है। जबकि श्रमिकों के हितों के लिए कार्य करने वाले संबंधित विभाग शोषण के खिलाफ शिकायत मिलने का इंतजार ही करते हैं।
सेहत दे या न दे, लेकिन हाडतोड़ मेहनत करते-करते जिंदगी बीत जाती है। अधिकांश श्रमिकों के अपने लिए आशियाना बनाने के सपने उनके अधूरे ही रह जाते हैं। मजदूरी का यह सिलसिला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मानों चलता ही रहता है। हालांकि अब मजदूरों के बच्चों में शिक्षा को लेकर बढ़ रही जागरूकता से समाज में बड़ा बदलाव होने की उम्मीद है।
Published on:
01 May 2025 08:04 am
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