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आचार्य विद्यासागर : सहस्त्रकूट जिनालय और प्रतिभा स्थली का हुआ भूमिपूजन

सुबह 7 बजे आचार्य विद्यासागर महाराज पूरे ससंघ के साथ शिलान्यास स्थल पर बनाए गए मंच पर विराजमान हुए। इस दौरान आचार्य का पाद प्रच्छालन किया गया

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Acharya Vidyasagar Maharaj

Acharya Vidyasagar Maharaj

टीकमगढ़..अतिशय क्षेत्र पपौरा में रविवार की सुबह आचार्य विद्यासागर महाराज के सानिध्य में सहस्त्रकूट जिनालय एवं प्रतिभा स्थली विद्यापीठ का शिलान्यास एवं भूमिपूजन हुआ। कार्यक्रम उपरांत आचार्यश्री के जयकारों से क्षेत्र गूंज उठा। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी हजारों लोग बने।

आचार्य विद्यासागर जी महाराज की गुरूभक्ति सुबह 5.30 बजे से शुरू हुई। सुबह 7 बजे आचार्य विद्यासागर महाराज पूरे ससंघ के साथ शिलान्यास स्थल पर बनाए गए मंच पर विराजमान हुए। इस दौरान आचार्य का पाद प्रच्छालन किया गया एवं ब्रम्हचारी बहनों द्वारा आचार्य श्री का संगीत के साथ पूजन किया गया। वैदिक मंत्रोच्चारणों के बीच शिलान्यास एवं भूमिपूजन का कार्यक्रम संपन्न हुआ।

पपौरा की भूमि 32 वर्ष से कर रही थी मेरा इंतजार

उन्होंने अपने मंगल प्रवचनों के दौरान कहा कि अतिशय क्षेत्र पपौरा में पिछले 8 दिनों से पुण्य की बारिश हो रही है। मेरी भावना यही है कि ऐसे ही आगे भी पुण्य की की बरसात होती रहे। उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड की धरा और यहां के लोग बहुत ही पुण्यशाली है। मुझे ऐसा लग रहा है कि 32 वर्षों से सिद्ध क्षेत्र पपौरा की भूमि मेरा इंतजार कर रही थी। 32 वर्ष बाद उस भूमि का इंतजार समाप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि शिलान्यास मंगलाचरण के रूप में कार्य शुरू हुआ है अभी मुख्य कार्य तो होना है। शिलान्यास की शुभ घडिय़ां अतिथियों को स्वयं ही बुला लेती हैं।

उन्होंने बाहर से आए हुए धर्मप्रेमियों से कहा कि बुंदेलखण्ड में जैन तीर्थ बहुत हैं, आप यहां आकर अपनी द्रव्य का उपयोग करें एवं द्रव्य के साथ अपने भावों से क्षेत्रों की वंदना करें। उन्होंने बताया कि जब उनके गुरू ज्ञानसागर की समाधि होने को थी तब उन्होंने कहा था कि पूरे संघ को ही गुरूकुल बना डालो। उन्हीं ज्ञानसागर के वचनों को चरितार्थ करते हुए पपौरा जी में प्रतिभास्थली का शिलान्यास हुआ है।

उन्होंने बताया कि इस शुभ घड़ी में टीकमगढ़ के पपौरा के साथ ही इंदौर के उदयनगर में आर्यिका आदर्शमति माता के सानिध्य में शिलान्यास समारोह हो रहा है। उन्होंने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भावों में दरिद्रता नहीं मानी जाती, व्यक्ति के भाव ही उसकी पहचान होते है। जो लोग निर्मल भावों से भगवान की आराधना करते हैं दूसरों पर दया करते हैं, गरीबों की सहायता करते हैं, दूसरों पर परोकपकार करते हैं, देवता भी स्वर्ग से आकर ऐसे लोगों की वंदना करते हैं।