19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

खाद्य सुरक्षा कानून में होता रहता है बदलाव, बाजार में आ जाते हैं खतरनाक उत्पाद

ऐसा देखा गया है कि खाद्य सुरक्षा कानूनों को समय-समय पर सरलीकृत कर दिया जाता है।

3 min read
Google source verification
food

नई दिल्ली : 2025 तक भारत का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ७२ लाख करोड़ सालाना पहुंचने की उम्मीद है, जबकि ऐसा अनुमान है कि इस साल के अंत तक वह बढक़र ६० लाख करोड़ हो जाएगा। 2012 से 2015 के बीच, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ने नए फॉर्मूले के साथ लगभग 4,500 उत्पादों को पेश किया। लेकिन इसके बावजूद दो भागों में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बढ़ते इस उद्योग के साथ तालमेल बनाने में नाकाम रही है। हाल ही में प्रकाशित हुई पहले भाग में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के निष्कर्षों से पता चलता है कि किस तरह अथॉरिटी ने उन खाद्य पदार्थों को बेचने की अनुमति दी, जो जांच में खतरनाक साबित हुईं।
दिसंबर 2013 में, भारत में खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण, जो यह सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है कि देश में उपभोक्ताओं को बेचा जाने वाला भोजन सुरक्षित है उसने पुष्पम फूड्स और बेवरेजेज नामक एक कंपनी को रेस्टलेस जिनसेंग नामक एक एनर्जी ड्रिंक बेचने की अनुमति दी। एक साल के भीतर खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण के वैज्ञानिकों ने वरिष्ठ अधिकारियों को यह जानकारी दी कि रेस्टलेस जिनसेंग में दो मुख्य सामग्री कैफीन और जीन्सेंग हैं, जिनका मिश्रण बेहद खतरनाक होता है और यह हॉर्टरेट और रक्तचाप को बढ़ा सकता है, जिसे पहले से ही पूरी दुनिया जानती है।
इस रिपोर्ट के भी सात महीने बाद जून 2015 में प्राधिकरण ने उत्पाद बेचने के लिए कंपनी को दिए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र वापस लिया। डेढ़ साल तक कंपनी हानिकारक उत्पाद का निर्माण और बिक्री करती रही। प्राधिकरण की कार्रवाई के बावजूद, पुष्पम फूड्स ने अपनी वेबसाइट पर इस पेय पदार्थ का प्रचार जारी रखा है। खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण यह भी जांचने में विफल रहा कि उत्पाद बाजार से वापस ले लिया गया या नहीं।
जैसा कि भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में बताया कि प्राधिकरण ने 2011 में तैयार किए गए अपने दिशा-निर्देशों के अनुसार फैसला किया था कि रेस्टलेस जिनसेंग जैसे उत्पादों को सीधे बाजार में नहीं रखा जा सकेगा। ऐसे पदार्थों के लिए खाद्य कंपनियों को वैज्ञानिक प्रमाण लेने का जरूरत होगी कि उनका उत्पाद सुरक्षित है। प्राधिकरण के वैज्ञानिकों के संतुष्ट होने के बाद ही उत्पाद को बाजार में रखने की अनुमति मिलेगी।

दिशा निर्देशों का सरलीकरण
रेस्टलेस जिनसेंग इसका एकलौता उदाहरण नहीं है। प्राधिकरण ने स्थापित प्रोटोकॉल को नजरअंदाज किया और वैज्ञानिकों से चेतावनियों की भी चिंता नहीं की। उनकी सुरक्षा का मूल्यांकन किए बिना नए फॉर्मूलेशन के साथ बने 800 से अधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को 2012 के बाद से बेचने की अनुमति दी। इनमें से कुछ तो अब भी बाजार में मौजूद हैं। इसके लिए प्राधिकरण ने २०११ के दिशा-निर्देशों को हल्का कर बिना वैज्ञानिक जांच के एक साल के लिए अस्थायी तौर पर उत्पादों को बाजार में लाने की अनुमति दे दी।
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 को आसान बनाकर ऐसा किया गया, जिसके अनुसार, खाद्य पदार्थ खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं यह सिर्फ वैज्ञानिकों का पैनल तय कर सकता है। इसके अनुसार, वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकृत करने के बाद ही अधिकारी किसी को उत्पाद बेचने के लिए लाइसेंस जारी कर सकते हैं। रेस्टलेस जिनसेंग 100 में एक ऐसा उत्पाद है, जिसे प्रॉपराइटरी फूड के तौर पर बेचा जा रहा था। इन खाद्य पदार्थों में कानून के तहत पूर्व निर्धारित सुरक्षा मानक नहीं होते हैं, जे नमकीन, नूडल्स, सूप और पास्ता आदि के लिए तय होते हैं।

कैग ने क्या पाया
जब सीएजी ने 2012 से 2014 के बीच उपभोक्ताओं को बिक्री के लिए अनुमोदित 50 प्रॉपराइटरी फूड का परीक्षण किया, तो यह पाया कि इनमें सरलीकृत नियमों का भी पालन नहीं किया गया है। कई मामलों में, प्राधिकरण ने अस्थायी अनापत्ति प्रमाण पत्र देने के बाद भी वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए उत्पाद नहीं भेजा। मई 2015 तक प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की लिखी एक नोट से पता चलता है कि प्राधिकरण ने हजार से अधिक उत्पादों को अस्थायी अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किए, लेकिन परीक्षण के लिए सिर्फ 200 को भेजा था।