
famous kaali temple of india
जबलपुर। देशभर में हर जगह दुर्मामंदिर हैं पर संस्कारधानी में ऐसे अनेक स्थान हैं जोकि सिद्ध माने जाते हैं। माता के अनेक मंदिर ? अपनी विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। शहर के दीक्षितपुरा में स्थित मंदिर भी इनमें से एक हैं। यहां स्थापित माता को तो चमत्कार वाली माता के ही रूप में जाना जाता है। इसके अलावा भी अनेक मंदिर मां के विभिन्न रूपों को प्रकट कर रहे हैं।
रूप बदलनेवाली माता- माला देवी मंदिर
पुरवा झंडा चौक स्थित माला देवी का यह प्राचीन मंदिर है। मंदिर में प्राचीन काल की देवी प्रतिमा स्थापित है। देवी प्रतिमा को लेकर मान्यता है की पूर्व में मैया यहां सुबह कन्या, दोपहर में युवावस्था व शाम को वृद्धा का स्वरूप धारण करती थीं। लगभग दो दशक पहले यह प्रतिमा चोरी चली गई थी। कई दिनों की मशक्कत के बाद पुलिस प्रतिमा को वापस ढूंढ़ लाई। इस ऐतिहासिक मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
चमत्कारवाली माता- छोटी देवन दीक्षितपुरा
गोंडवानाकालीन मंदिर है। मंदिर में आस्था का सैलाब उमड़ता है। मंदिर में पीपल का पुराना पेड़ है। श्रद्धालुओं का अनुभव है कि इस मंदिर में या पीपल की छांव के नीचे बैठकर असीम शांति का अनुभव होता है। नवरात्र पर मंदिर में ९ दिन अखंड रामायण पाठ का आयोजन जारी है। रात साढ़े ३ बजे से ही मंदिर में जल चढ़ाने श्रद्धालुओं की भीड़ उमडऩे लगती है।
स्वयंसिद्ध दरबार - कालीमाइ मंदिर सदर
काली माता की यहां विराजित प्रतिमा स्वयं सिद्ध बताई जाती है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार गर्मी के दिनों में मैया के माथे से पसीना निकलने लगता है। मैया को गर्मी न लगे इसके लिए पहले भक्तजनों ने यहां पंखा, कूलर लगवाए। उनसे ज्यादा असर नहीं पड़ा तो मैया के लिए एसी लगवाया गया। गोंडवाना साम्राज्य के द्वारा साढ़े पांच सौ साल पहले यह मंदिर स्थापित किया गया था।
झंडेवाली माता- शारदा मंदिर मदनमहल
शारदा माता का यहां पूजन कर श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। साढ़े पांच सौ साल से ज्यादा पुराने मंदिर में मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु विशाल ध्वज अर्पित करते हैं। इस मंदिर में दोनों नवरात्रि के अलावा सावन के महीने में भी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। बुजुर्गों के अनुसार सूखा पडऩे पर साम्राज्ञी रानी दुर्गावती ने देवी का आह्वान कर यहां माता का मंदिर स्थापित कराया था।
रोग हरती मैया, शीतलामाइ मंदिर
मंदिर में मैया शीतला की प्राचीन व नई दो प्रतिमाएं विराजी हैं। गोंडवानाकालीन प्राचीन प्रतिमा ब्रिटिश काल में स्थापित की गई थी। जबकि मंदिर ७० के दशक में बनाया गया। एेसी मान्यता है की यहां शीतला माता का पूजन करने से सभी रोग दूर होते हैं और आरोग्यता आती है। मैया को शीतला अष्टमी पर बसोरा (एक दिन पहले बनाए गए प्रसाद) का भोग लगाया जाता है। प्रसाद प्राप्त करने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
Published on:
23 Mar 2018 04:17 pm
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