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जानिए क्यों मनाया जाता है मोहर्रम

#Muharram news : धौलपुर , बाड़ी. इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस माह की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा कहा जाता है। इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है। बाड़ी मुस्लिम समाज के अध्यक्ष बाबूल सईद खान ने बताया कि इसी कुर्बानी की

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Know why Muharram is celebrated

जानिए क्यों मनाया जाता है मोहर्रम

जानिए क्यों मनाया जाता है मोहर्रम

#Muharram news : धौलपुर , बाड़ी. इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस माह की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा कहा जाता है। इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है। बाड़ी मुस्लिम समाज के अध्यक्ष बाबूल सईद खान ने बताया कि इसी कुर्बानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। करबला का यह वाकया इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है। मोहर्रम की 7 तारीख को बाड़ी में बड़े किले से बस्ती के तमाम अलम एक साथ मिलकर किला गेट, सराफा बाजार, लुहार बाजार, मलक पाडा, किरी, सैंपऊ रोड, गुमट, छोटा किला, अजीज पुरा, बसेड़ी रोड, कसाई पाडा, बटबाल पाडा, संतराश पाडा होते हुए हथियापोर से किला गेट पर कियाम करते हैं। मुस्लिम समाज कमेटी के प्रवक्ता जुबेर पठान ने बताया कि मोहर्रम की 8 तारीख को शिया समुदाय के लोग दमदमा स्थित शिया मस्जिद से मातम मानते हुए पुराना बाजार किला गेट होते हुए इमाम बाडा में मसिया पड़ते है। मोहर्रम की 9 तारीख की रात को हर बस्ती में ताजियों को बस्ती भर में घूमाया जाता है और चांद की 10 तारीख को अल सुबह सभी ताजिया अपनी अपनी ताजिया चौकी से अखाड़ा तलवार बाजी पटेबाजी खेलते हुए बसेड़ी रोड स्थित कर्बला के लिए जाते है वहा उनको सुपुर्द ए खाक किया जाता है।

क्यूं मनाते हैं मोहर्रम
मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों का कत्ल कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।

इमाम हुसैन को इस वजह से थी यजीद से नाइत्तेफाकी
इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल-कपट, झूठ, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में ***** बताई गई हैं। हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी। दूसरी तरफ इस्लाम का जहां से उदय हुआ। मदीना से कुछ दूर शाम में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद जिसमें सभी अवगुण मौजूद थे। वह शाम की गद्दी पर बैठा। यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है। यजीद जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से हजरत मोहम्मद के घराने ने साफ इन्कार कर दिया था क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। यजीद की बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हजरत मोहम्मद साहब का शहर मदीना छोड़ देंगे ताकि वहां अमन कायम रहे।

इस हाल में तय हुई थी जंग
इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोडकऱ परिवार और कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे। लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया। यजीद ने उनके सामने शर्तें रखीं जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया। शर्त नहीं मानने के एवज में यजीद ने जंग करने की बात रखी। यजीद से बात करने के दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी के किनारे तम्बू लगाकर ठहर गए। लेकिन यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से हटाने का आदेश दिया और उन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी। इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी और गर्मी का वक्त था। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था वह खत्म हो चुका था।

परिवार व अनुनायी रहे भूखे प्यासे
10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक.एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी मारे जा चुके थे तब असर (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वह भी मारे गए। इस जंग में इमाम हुसैन का एक बेटे जैनुलआबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मुहम्मद साहब की पीढ़ी चली।