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श्रीगंगानगर का जांबाज जासूस, जिसने फेर दिया था पाकिस्तान के मंसूबो पर पानी

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Ravindra kaushik

श्रीगंगानगर का जांबाज जासूस, जिसने फेर दिया था पाकिस्तान के मंसूबो पर पानी

मंगेश कौशिक
श्रीगंगानगर.

वह गजब का कलाकार था और उसकी इसी खासियत ने उसे भारत का नामवर जासूस बना दिया। नाम रविन्द्र कौशिक उर्फ घोला। श्रीगंगानगर के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में ११ अप्रेल १९५२ को जन्मे रविन्द्र बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। व्यक्तित्व इतना आकर्षक कि साथी-संगी उन्हें हीरो कहने के साथ-साथ फिल्मों में काम करने के लिए मुम्बई जाने की सलाह देते रहते।

भारत-चीन युद्ध के बाद विद्यालय के वार्षिकोत्सव में चीनी सेना के हत्थे चढ़े एक भारतीय सैनिक को दी गई यातनाओं का अभिनय करते हुए रविन्द्र खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी की आंखों में ऐसा चढ़ा कि बाद में यही अभिनय उनकी जिन्दगी की हकीकत बन गया। खुफिया एजेंसी के उसी अधिकारी ने रविन्द्र का परिचय जासूसी की दुनिया से करवाया और कड़े प्रशिक्षण के बाद उसे एक मिशन पर पाकिस्तान भेज दिया गया। मिशन कामयाब रहा और रविन्द्र को मिला ब्लैक टाइगर का तमगा जो विरले जासूसों को ही मिल पाता है।
खुफिया एजेंसी ने रविन्द्र को दूसरा टारगेट १९७५ में दिया।

टारगेट कठिन था और पकड़े जाने का मतलब था मौत या फिर पाकिस्तान की जेलों में मौत से भी बदतर यातनाएं। दिल और दिमाग में देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो मौत व यातनाएं कोई मायने नहीं रखती। यही जज्बा और जुनून रविन्द्र को दुबारा पाकिस्तान ले गया। इस बार पाकिस्तान में उसे नाम मिला नबी अहमद और नौकरी मिली उसी सेना में जो आज भी भारत को बर्बाद करने का मंसूबा पाले हुए है। सेना में अधिकारी होने के नाते नबी अहमद उर्फ रविन्द्र की शादी भी एक रईस शेख खानदान में हुई।

पाक के राष्ट्रपति रहे जनरल जिया जब फौज में थे तब रविन्द्र उनके चहेते अफसरों में से एक था। खैर! सेना की नौकरी करते हुए रविन्द्र ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम सहित कई महत्वपूर्ण सूचनाएं अपने देश को दी। दुश्मन देश में जान हथेली पर रखकर अपने देश के लिए जासूसी कर रहे रविन्द्र ने घरवालों को कभी इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि वह कहां रह रहा है और क्या कर रहा है। दुबई या अन्य देशों से होते हुए जब भी वह घर आता तो यही कहता कि उसे दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी मिली है और काम के सिलसिले में विदेशों में भी जाना पड़ता है।

पंजाब को बचा लिया
पंजाब में जब आतंकवाद चरम पर था तभी रविन्द्र को पता चला कि बांग्लादेश का बदला लेने के लिए पाकिस्तान पंजाब को भारत से अलग करने की साजिश रच रहा है। पंजाब में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के कमाण्डरों की पाकिस्तानी सेना के अफसरों से बातचीत और उन्हें हथियार उपलब्ध कराने की सूचनाएं तो रविन्द्र पहले भी देता रहता था। पंजाब को भारत से अलग करने की साजिश तो और भी खतरनाक थी। जैसे-तैसे रविन्द्र ने यह सूचना भारत को दी तो पहले तो इस पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन भारत के दो मित्र देशों की खुफिया एजेंसियों ने इसकी पुष्टि की तो भारत सरकार ने पंजाब में आतंकवाद के खात्मे की योजना पर गंभीरता से विचार शुरू कर दिया। पाकिस्तान की साजिश सार्वजनिक हुई तो सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार करना पड़ा।

यातनाओं की लंबी पारी
पंजाब को अलग करने की सूचना देने के बाद रविन्द्र को वापसी का इशारा मिल चुका था। वर्ष १९८३ में भारत वापसी से एक दिन पहले लाहौर में पाकिस्तानी सेना ने रविन्द्र को जासूसी के आरोप में पकड़ लिया। उसे फांसी की सजा हुई जो बाद में उम्रकैद में बदल गई। अमानवीय यातनाओं के साथ रविन्द्र ने १८ साल पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में गुजारे।

यातनाएं ऐसी थी कि रविन्द्र के शरीर में कई बीमारियों ने घर बना लिया। परिवार वालों को पता चला तो पिता की हृदयघात से मौत हो गई। मां और छोटे भाई ने १८ साल तक रविन्द्र की वापसी के प्रयास किए। पाकिस्तान की मियांवाली सेन्ट्रल जेल में २१ नवम्बर २००१ को भारत के इस जाबांज जासूस ने आखिरी सांस ली। तब उम्र थी ४९ साल। घर वालों को ठीक एक साल बाद पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग के माध्यम से रविन्द्र की मौत की सूचना मिली। मां की इच्छा थी कि बेटे को नहीं तो पाकिस्तान में रह रही बेटे की बहू और पोते को ही देख लूं। अफसोस मां की यह इच्छा भी कुछ साल पहले उसके साथ चली गई।


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