
अलगोजा वादक तगाराम भील (फोटो-पत्रिका)
जैसलमेर। थार की रेत से उठती सुरों की सदियों पुरानी परंपरा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले विख्यात अलगोजा वादक तगाराम भील को पद्मश्री पुरस्कार 2026 से सम्मानित किए जाने की घोषणा ने पूरे मरु अंचल को गौरवान्वित कर दिया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची में उनका नाम शामिल होना राजस्थान के लोक संगीत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।
जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव के निवासी 62 वर्षीय तगाराम भील ने लोक वाद्य अलगोजा की मधुर धुनों को गांव की चौपालों से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। बेहद सादा जीवन जीने वाले तगाराम भील ने इस सम्मान को अपनी साधना, गुरुजनों के आशीर्वाद और क्षेत्रवासियों की दुआओं का परिणाम बताया है।
तगाराम का संगीत सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। बचपन में जब पिता घर पर नहीं होते थे, तब वे चुपके से अलगोजा निकालकर अभ्यास किया करते थे। महज 10 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस वाद्य पर पकड़ बना ली थी और 11 साल की उम्र में पहला अलगोजा खरीदकर विधिवत संगीत यात्रा शुरू की। वर्ष 1981 में जैसलमेर के मरु महोत्सव से उनका मंचीय सफर शुरू हुआ, जो 1996 में फ्रांस तक पहुंचा।
इसके बाद तगाराम भील ने अमेरिका, रूस, जापान, अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों में राजस्थानी लोक संगीत की प्रस्तुति देकर थार की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। खास बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बावजूद वे आज भी अपनी आजीविका के लिए खनन कार्य से जुड़े हुए हैं।
तगाराम भील केवल एक कुशल वादक ही नहीं, बल्कि एक दक्ष शिल्पकार भी हैं। वे अपने हाथों से अलगोजा तैयार करते हैं, जिनकी मांग देश-विदेश तक है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि लोक कला की साधना दिखावे की नहीं, बल्कि तपस्या की मांग करती है।
पद्मश्री सम्मान की यह घोषणा केवल तगाराम भील की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन दुर्लभ लोक कलाओं की जीत है, जो आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले जैसलमेर के हमीरा गांव के कमायचा वादक साकर खान और बईया गांव के लोक कलाकार अनवर खान को भी पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।
अलगोजा एक सुशीर (वायु) वाद्य यंत्र है, जो बांस से बनी दो जुड़ी हुई बांसुरी (पाइप) का जोड़ा होता है। इसमें एक बांसुरी सुर के लिए और दूसरी ड्रोन निरंतर ध्वनि के लिए होती है, जिसे मुंह से हवा फूंककर बजाया जाता है। वादक एक साथ दोनों बांसुरियों को मुंह में दबाकर फूंकता है। एक से धुन निकलती है और दूसरी से लगातार स्वर निकलता है। यह राजस्थान, पंजाब, सिंध और गुजरात के लोक संगीत में प्रमुखता से इस्तेमाल होता है।
Published on:
25 Jan 2026 09:29 pm
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