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अमेरिका के इस मसीहा ने पूरे गांव की किस्मत बना दी, झारखंड के बच्चे बने अंग्रेज़ फुटबॉलर

गांव की लड़कियां केवल फुटबॉल ही नहीं खेलती बल्कि फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलती हैं।

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Ravi Gupta

Dec 22, 2017

yuva

नई दिल्ली। फ्यूचर है फुटबॉल, ये तो आजकल बहुत सुनने को मिल रहा है। लगता है रांची के एक गांव के लोग शायद इस बात को अपने जेहन में डाल चुके है। जी, हां हम बात कर रहे है रांची के ओरमाझी प्रखंड में स्थित गांवों की। इन गांवो में केवल लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियां भी फुटबाल में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे है। जहां लड़कियों को केवल घर के काम-काज में समेटकर रखा जाता है, वहीं इस गांव की लड़कियां फुटबॉलर बनने का सपना देखती है।

सिर्फ इतना ही नहीं इस गांव की लड़कियां केवल फुटबॉल ही नहीं खेलती बल्कि फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलती हैं। ये सबकुछ फ्रेंज गैसलर की वजह से संभव हुआ। फ्रेंज अमेरिका के मिनोसोटा में रहते है। उन्होंने अपनी पढ़ाई हावर्ड यूनिवर्सिटी से किया है। सिर्फ अपने सपने को साकार करने के लिए वो भारत आकर ये नेक काम कर रहे हैं। उनका सपना ये था कि वो भारत के पिछड़े ग्रामीण इलाकों में रहने वाली बच्चियों को सशक्त बनाएं।

अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने एक टीम की स्थापना की ताकि वो खेल-खेल में इनको पढ़ा भी सकें और साथ में फुटबॉल में भी इन्हें करियर बनाने का मौका मिले। फ्रेंज ने इस संस्था का नाम रखा- युवा। युवा संस्था की ओर से गर्ल्स फुटबॉल अकादमी की स्थापना की गई है और ये अकादमी रांची के रूक्का के पास हुटूप गांव में स्थित है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि ये युवा गर्ल्स फुटबॉल टीम 2013 में स्पेन में आयोजित अंडर 14 फुटबॉल चैंपियनशिप गस्टिज कप में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। आज इस गांव का हर बच्चा फुटबॉल खेलने में माहिर है। वर्तमान समय में 300 से भी अधिक बच्चियां इस अकादमी में फुटबॉल सीख रही हैं। फ्रेंज 2009 में रांची आए थे और तब से उन्होंने अपने इस मुहिम को अंजाम देना शुरू किया था। हर रोज सुबह करीब 4 बजे बसें विभिन्न गांवो में पहुंचकर बच्चों को अकादमी ले आती है। लड़कियों की ये टीम ट्रेनिंग के लिए अमेरिका भी जा चुकी है। इसमें आदिवासी लड़कियां ही ट्रेनिंग के लिए आती है। फ्रेंज के इन प्रयासों से इन गरीब बच्चों के सपनों को एक नई उड़ान मिल रही है।