इलाके में नहरी पानी बड़ा मुद्दा

इलाके में नहरी पानी बड़ा मुद्दा

jainarayan purohit | Publish: Sep, 03 2018 10:11:19 AM (IST) Sri Ganganagar, Rajasthan, India

कृषि भूमि को सिंचित करने वाली तीनों नहर प्रणालियों में सिंचाई पानी का संकट


श्रीगंगानगर.

कृषि प्रधान श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में नहरी पानी का संकट बड़ा मुद्दा बनता रहा है। इस बार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गंगनहर, भाखड़ा और इंदिरा गांधी नहर के किसान सिंचाई पानी की कमी के चलते खरीफ की फसल को बर्बाद होते देखने को मजबूर हैं। बरसात की कमी, अत्यधिक तापमान और उस पर सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने से खेतों में खड़ी फसलें झुलस कर दम तोड़ रही हैं।

किसान इस स्थिति को देखकर हताश हैं। सिंचाई पानी को लेकर आंदोलन भी हुए। लेकिन इनसे किसानों को कोई फायदा हुआ हो एेसा दिखाई नहीं देता। इस बार नहरी पानी का संकट राजस्थान की नहरों को पानी की आपूर्ति करने वाले बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं होने से बना है। पोंग, भाखड़ा और रणजीत सागर बांध अभी रीते पड़े हैं। इनके भराव का समय भी २० सितम्बर को पूरा हो जाएगा।


सिंचाई पानी का संकट नया नहीं। इंदिरा गांधी नहर में सिंचाई पानी की कमी के चलते २००४ में घड़साना क्षेत्र में किसानों का उग्र आंदोलन शुरू हुआ जिसकी आंच २००७ तक सरकार को तपाती रही। इस आंदोलन में सात किसानों को जान से हाथ धोना पड़ा और करोड़ों की संपत्ति किसानों के गुस्से की भेंट चढ़ गई।

इंदिरा गांधी नहर के चार में से दो ग्रुपों में पानी चलाने की मांग पर घड़साना में आंदोलन इस बार भी चल रहा है। भाखड़ा के किसान भी आंदोलन की राह पर है। गंगनहर के किसान दो साल से शेयर के अनुरूप पानी देने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए कई बार आंदोलन भी हुए परन्तु नतीजा शून्य रहा। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड गंगनहर का शेयर २२०० क्यूसेक निर्धारित करता है। लेकिन राजस्थान बॉर्डर पर आजादी से पहले की इस नहर को १५००-१६०० क्यूसेक पानी मिल रहा है। शेयर का बाकी पानी कहां जा रहा है, इसका जवाब जल संसाधन विभाग के पास नहीं।

किसान संगठन उनके हिस्से का पानी इंदिरा गांधी नहर में डाले जाने का आरोप लगाते हैं और इसके लिए जल संसाधन मंत्री डॉ. रामप्रताप को जिम्मेदार ठहराते हैं। किसान संगठनों के इस आरोप को जल संसाधन मंत्री राजनीति से प्रेरित बताते हैं परन्तु गंगनहर के पानी में जो लोचा है उसका जवाब उनके पास भी नहीं।


मुद्दे को भुनाती रही पार्टियां
विधानसभा चुनाव में नहरों में सिंचाई पानी की कमी को राजनीतिक दल प्रमुख मुद्दा बनाते रहे हैं। भाजपा के राज के दौरान हुए चुनाव में सिंचाई पानी की कमी को कांग्रेस और अन्य दलों ने मुद्दा बनाया तो कांग्रेस के राज में यह भाजपा और अन्य दलों के लिए चुनावी मुद्दा बना है। घड़साना आंदोलन के बाद २००८ में १२ वीं विधानसभा के गठन के लिए हुए चुनाव में सिंचाई पानी मुख्य मुद्दा था और इस मुद्दे ने अनूपगढ़ विधानसभा सीट पर माकपा के पवन दुग्गल को जीत दिलाई।

उससे पहले माकपा का उस इलाके में कोई आधार नहीं था। इस बार कांग्रेस सिंचाई पानी के संकट को मुद्दा बनाने से नहीं चूकेगी और इसके लिए वह पानी की कमी से तबाह हुई खरीफ फसलों का हिसाब किसानों से पूछकर उनके घावों को हरा कर वोट की फसल काटेगी। भाजपा के राज में नहरी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम हुआ है। पानी की बचत के लिए पक्के खाळों के निर्माण का काम तेज गति से हुआ है। जर्जर हो चुकी इंदिरा गांधी नहर के जीर्णोद्धार की योजना पर भी काम शुरू हुआ है जो चार साल में पूरी होगी। यह काम पूरा होने पर इंदिरा गांधी नहर क्षमता के अनुरूप पानी लेने के योग्य हो जाएगी। कांग्रेस के आरोपों का जवाब भाजपा इन कार्यों को गिनाकर देगी।

इनका कहना है...
पंजाब में जब तक अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार रही, किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलता रहा। जब से वहां कांग्रेस की सरकार बनी है तब से पानी का संकट खड़ा हो गया। राजस्थान में कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए पंजाब नहरी पानी में गड़बड़ी कर रहा है ताकि राजस्थान के किसान आंदोलित हों और उसका फायदा कांग्रेस को वोटों के रूप में मिले। किसानों को इसे समझना चाहिए।
निहाल चंद,
सांसद गंगानगर लोकसभा क्षेत्र


भाजपा के राज में गंगनहर, भाखड़ा और इंदिरा गांधी नहर के किसान सिंचाई पानी के संकट से त्रस्त हैं। कांग्रेस इसे निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा बनाएगी क्योंकि इस जिले की अर्थव्यवस्था का आधार खेती है। कांग्रेस चाहे सत्ता में रही या विपक्ष में, सिंचाई पानी के मुद्दे पर वह किसानों के साथ रही है और हमेशा रहेगी। प्रदेश में जब भी भाजपा की सरकार बनी किसान पानी के लिए तरसा है।
पृथ्वीपाल सिंह संधू,
पीसीसी सदस्य


सिंचाई पानी का संकट कांग्रेस की देन है और उसे भाजपा ने बरककार रखा है। यह संकट जल वितरण की अन्यायपूर्ण व्यवस्था की कोख से उपजा है। दो राज्यों के हित इससे जुड़े हुए हैं। पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की सरकार बनने के बाद संकट और गहराया है। यह सब मतदाताओं के शिकार की रणनीति है।
मनीराम पूनियां,
राजनीतिक विश्लेषक

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