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श्रीगंगानगर में सरहदी क्षेत्र के किसान तैयार कर रहे साजी, बीकानेर के पापड़ निर्माताओं की डिमांड

चर्चित मुहावरे ‘पापड़ बेलना’ का आशय भले ही कठोर परिश्रम से हो, लेकिन सच तो यह है कि पापड़ बनाने में भी कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। खासतौर पर पापड़ को जायकेदार व कडक़ बनाने वाली साजी को तैयार करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। साजी के कारण पापड़ में लंबे समय तक फफूंद भी नहीं लगती। गौरतलब है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से आयात होने वाली साजी महंगी होने के कारण इसका स्थानीय विकल्प खोजा गया। यह काफी हद तक कारगर साबित हुआ है। साजी की सर्वाधिक खपत बीकानेर में होती हैं, जहां सैंकड़ों पापड़ के कारखाने

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इस तरह तैयार होती है पापड़ की साजी
पापड़ को जायकेदार व कडक़ बनाने में साजी का अहम योगदान
महेन्द्र सिंह शेखावत ञ्चश्रीगंगानगर
चर्चित मुहावरे ‘पापड़ बेलना’ का आशय भले ही कठोर परिश्रम से हो, लेकिन सच तो यह है कि पापड़ बनाने में भी कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। खासतौर पर पापड़ को जायकेदार व कडक़ बनाने वाली साजी को तैयार करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। साजी के कारण पापड़ में लंबे समय तक फफूंद भी नहीं लगती। गौरतलब है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से आयात होने वाली साजी महंगी होने के कारण इसका स्थानीय विकल्प खोजा गया। यह काफी हद तक कारगर साबित हुआ है। साजी की सर्वाधिक खपत बीकानेर में होती हैं, जहां सैंकड़ों पापड़ के कारखाने हैं। श्रीगंगानगर व बीकानेर जिले में सरहद के पास तारबंदी के नजदीक साजी के पौधे की पैदावार अधिक होती है। विशेषकर श्रीगंगानगर जिले के श्रीकरणपुर के नग्गी, रायसिंहनगर के खाटा, घड़साना तथा बीकानेर के खाजूवाला आदि क्षेत्र में साजी के पौधे बहुतायत में हैं। इन दिनों सरहदी क्षेत्र में साजी के पौधे काटकर ढेर लगा दिए गए हैं, साथ ही नए स्तर पर बिजाई भी कर दी गई है। इसकी फसल तैयार होने में लगभग एक साल का समय लगता है।
खड़ी फसल का होता है सौदा
पापड़ के लिए साजी का अहम योगदान है, लेकिन इसको बेचने के लिए कोई मंडी नहीं है। बीकानेर के व्यापारी किसानों से सीधे सम्पर्क कर साजी की खड़ी फसल का सौदा कर लेते हैं और अपने स्तर पर तैयार करवाते हैं। 15 हजार प्रति बीघा के हिसाब से इसका सौदा होता है, जबकि साजी बनने के बाद इसकी कीमत 30 से 40 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है। जानकारों की मानें तो एक बीघा में करीब एक क्विंटल साजी बन जाती है।
साल में एक ही फसल, अधिक पानी की जरूरत नहीं
बंजर पड़ी क्षारीय व अनुपजाऊ भूमि में साजी की फसल को लेकर किसानों का रुझान बढ़ा है। वर्ष में केवल एक ही फसल होती है। बीते साल सितंबर -अक्टूबर में साजी की कटाई के बाद फरवरी माह में फिर से फुटान हो गया है। यह फसल आगामी सितंबर-अक्टूबर महीने में फिर से कटाई योग्य हो जाएगी। साजी की पैदावार शुष्क मौसम में अधिक होती है। इसकी बुवाई बरसात से पहले जमीन में बीजों का छिडक़ाव कर की जाती है। पौधा तैयार कर पौधरोपण भी किया जाता है। क्यारियां बनाकर या गढ्डे खोदकर भी इसकी बुवाई की जाती है। अधिक बरसात होने पर इसकी पैदावार कम होती है।
साजी बनाने की प्रक्रिया
1. साजी के पौधे काटकर सुखाते हैं।
2. भट्टीनुमा गढ्डे में जलाया जाता है।
3. तरल पदार्थ गढ्डे में जम जाता है।
4. ठंडा होने में 20 दिन लगते हैं, उसके बाद यह ठोस अर्थात पत्थर बन जाती है।
जाली के ऊपर साजी एकत्रित होती है, जबकि जाली के नीचे चौवा जमा होता है। चौवे का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है। साजी का चूण पानी में मिलाकर छानते हैं। साजी का पानी ही पापड़ को जायकेदार व कडक़ बनाता है।

इनका कहना है
एक बीघा भूमि में दो से ढाई क्विंटल साजी पैदा हो जाती है। खर्च निकालकर करीब 15 हजार रुपए का फायदा मिल जाता है।
बहाल चंद व बलराम कड़वासरा, किसान।
साजी की फसल में प्रति मुरब्बा लगभग 50 क्विंटल प्रतिवर्ष उपज के हिसाब से छह से सात लाख रुपए की आय हो जाती है।
आईदान, गांव खाटां।
5 साल का फसल चक्र
साजी झाड़ प्रकृति की फसल है। इसके लिए शुष्क जलवायु और क्षारीय भूमि उपयुक्त रहती है। बिजाई खरीफ में और कटाई रबी के सीजन में होती है। इसकी बार-बार बिजाई नहीं करनी पड़ती है। ऊपर से काटते हैं तो फिर से फुटान हो जाता है। इसका पांच साल का फसल चक्र होता है।
सत्यपाल सहारण, सहायक कृषि अधिकारी (उद्यान) रायसिंहनगर ।

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