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40 साल से 40 परिवारों को नहीं मिला आसरा

शुद्ध हवा-पानी और आवास को तरस रहे लोग...

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home not available for needy people

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श्रीगंगानगर. शहर में विकास का दावा करने वाले प्रशासन, जनप्रतिनिधि व नगरपरिषद के अधिकारियों ने कभी अपने ही कार्यालय के पीछे रेलवे पटरी के किनारे दस फीट की पट्टी में जीवन गुजार रहे परिवारों की कभी सुध नहीं ली है। करीब चालीस साल से यहां रह रहे इन चालीस परिवारों को आज तक आसरा नहीं मिल पाया है। हालात ये हैं, इनको न तो शुद्ध हवा मिल पाती है, न पानी व अन्य मूलभूत सुविधाएं। रेलवे पटरी के सहारे बनी दीवार के पीछे करीब चालीस परिवार चालीस साल पहले मद्रास व महाराष्ट्र से आकर यहां बसे थे। यह लोग अन्य परिवारों की तरह खानाबदोश भी नहीं हैं। लिहाजा वे यहां आकर आगे नहीं गए।

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यहीं बस गए लेकिन इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद इनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। यहां रेलवे की दीवार व नगरपरिषद की दूसरे भवन के बीच करीब आठ-दस फीट की जगह पर अपनी झुग्गियों में रहते हैं। इनके राशनकार्ड, वोटर आईडी कार्ड आदि बने हुए हैं। यहां न तो उनके लिए स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था है। न बिजली है और न आने-जाने के लिए कोई उचित रास्ता है। पानी के लिए इन परिवारों के लोगों को दिनभर इधर-उधर भटकना पड़ता है। इन लोगों का आरोप है कि यदि वे स्टेशन पर पानी लेने जाते हैं, तो उनको वहां से भगा दिया जाता है।

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केवल वोट मांगने आते हैं नेता
इस बस्ती में रहने वाली महिलाओं व पुरुषों का कहना है कि उनके राशनकार्ड व वोटर आईडी कार्ड बने हुए हैं। जब चुनाव आते हैं तो नेता वोट लेने उनके पास जरूर आते हैं। इसके बाद यहां कोई उनको देखने नहीं आता है। चुनाव के दौरान विधायक कामिनी जिंदल यहां आई थीं और उनको कहीं उचित स्थान पर बसाने व सुविधाएं मुहैया कराने का आश्वासन दिया था लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ है। इन लोगों ने बताया कि यदि उनको कहीं अन्य स्थान पर बसाया जाए तो वे किश्तों में भुगतान करने को भी तैयार हैं।

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मजदूरी करते हैं परिवार के लोग
बस्ती के ज्यादातर पुरुष व महिलाएं मजदूरी करते हैं। इसमें शादी समारोह में टैंट वाले की लाइटें उठाना, वेटर, स्टेशन के आसपास मजदूरी करना सहित अन्य श्रम के कार्य कर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। यहां चालीस साल में इनके परिवार बढ़ गए हैं और यह स्थान अब छोटा हो गया है।

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