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सूरतगढ़। पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान की पहचान रही सेवण घास आज लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। ‘रेगिस्तान का सोना’ और ‘किंग ऑफ डेजर्ट’ कही जाने वाली यह घास अब प्राकृतिक चारागाहों से तेजी से गायब हो रही है।
इसका सीधा असर दुधारू पशुओं की सेहत और दूध उत्पादन क्षमता पर पड़ रहा है। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ क्षेत्र सहित थार के बड़े हिस्से में सेवण घास वर्षों तक देसी नस्ल की गायों के लिए सबसे भरोसेमंद और पौष्टिक चारे का स्रोत रही, लेकिन हाल के वर्षों में हालात बदल गए हैं।
श्रीगंगानगर जिले का सूरतगढ़ क्षेत्र पशु संपदा की दृष्टि से समृद्ध माना जाता है। खासकर टिब्बा बेल्ट में पशुपालन ग्रामीण जीवन की रीढ़ है। तहसील क्षेत्र में कुल 129.145 हैक्टेयर चारागाह भूमि दर्ज है, लेकिन इनमें से बड़ी हिस्सेदारी पर या तो खेती हो रही है या फिर कब्जे हैं।
पहले इन्हीं चारागाहों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली सेवण घास पशुओं का मुख्य आहार थी। वर्तमान में यह घास मुख्य रूप से महाजन फील्ड फायरिंग रेंज, उससे सटे क्षेत्रों और कुछ वन भूमि में ही बची है, जहां चराई पर प्रतिबंध होने से पशुपालक इसका लाभ नहीं ले पा रहे।
सरकारी और सहकारी डेयरी में दूध के भाव फैट और सॉलिड नोट फैट (एसएनएफ) के आधार पर तय होते हैं। सरकार की ओर से गाय के दूध में औसतन फैट 4.5 और एसएनएफ 8.5 निर्धारित है। इससे कम होने पर दूध के भाव घटा दिए जाते हैं या दूध खरीदा ही नहीं जाता।
टिब्बा क्षेत्र में करीब 90 प्रतिशत गायें राठी और अन्य देसी नस्लों की हैं। इनका फैट औसतन 3.27 दर्ज हो रहा है, जबकि एसएनएफ 7 से 8 के बीच ही सीमित है।
पशु विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका मुख्य कारण पौष्टिक प्राकृतिक चारे, खासकर सेवण घास का अभाव है। पहले सेवण की उपलब्धता से दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बेहतर रहती थीं।
पशुपालन विभाग पशुपालकों को अजोला घास को वैकल्पिक चारे के रूप में अपनाने की सलाह दे रहा है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अजोला सेवण का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता।
अजोला के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान और पर्याप्त पानी जरूरी है, साथ ही पशु फीड भी देना पड़ता है। इसके विपरीत सेवण घास कम पानी में, सूखे हालात में भी पनपती है और अधिक पौष्टिक होती है।
सेवण घास पश्चिमी थार रेगिस्तान के लिए प्रकृति का वरदान है। यह दुधारू पशुओं के लिए सर्वाधिक उपयुक्त चारा रही है, लेकिन चारागाहों के सिमटने और व्यवसायिक खेती के विस्तार से यह घास मरूस्थल से गायब होती जा रही है। यदि समय रहते इसके संरक्षण और चारागाह विकास पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो दुग्ध उत्पादन के साथ-साथ रेगिस्तानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संकट और गहराएगा।
Updated on:
30 Jan 2026 06:04 pm
Published on:
30 Jan 2026 06:02 pm

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