
datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)
1947 में पाकिस्तान से आए परिवारों ने कारोबार के नामों में बचाए जन्मभूमि के रिश्ते
श्रीगंगानगर. आजादी की वर्षगांठ पर आज देश तिरंगे के रंग में रंगा है, लेकिन विभाजन की पीड़ा झेलकर आए परिवारों के लिए आजादी की कहानी में एक ऐसा अध्याय भी है, जिसे वे आज तक अपने साथ संजोए हुए हैं। 1947 में पाकिस्तान से भारत आए लोगों ने घर, जमीन और कारोबार ही नहीं छोड़े, बल्कि जन्मभूमि की यादें, परंपराएं और अपनी सांस्कृतिक पहचान भी साथ लेकर आए। श्रीगंगानगर के बाजारों में आज भी ‘लायलपुर’ और ‘रावलपिंडी’ जैसे नाम उस दौर की स्मृतियों को जिंदा रखे हुए हैं।
दुकानों के नाम बने विभाजन की स्मृतियों के दस्तावेज
आंबेडकर चौक से गांधी चौक और वाल्मीकि चौक तक शहर के पुराने बाजारों में नजर डालें तो कई प्रतिष्ठानों के नाम सीधे उन शहरों और स्थानों से जुड़े मिलते हैं, जहां से उनके परिवार विभाजन के समय उजड़कर आए थे। ये नाम महज दुकानों की पहचान नहीं, बल्कि एक पीढ़ी के विस्थापन, संघर्ष और नई शुरुआत की कहानी कहते हैं।
विभाजन के बाद श्रीगंगानगर में बसे परिवारों ने बर्तन, कपड़े, साबुन, ज्वैलरी और किराना सहित छोटे-बड़े कारोबार शुरू किए। मेहनत के बूते धीरे-धीरे इन कारोबारों ने उन्हें नई पहचान दी। जवाहर मार्केट सहित शहर के कई बाजारों में आज भी ‘रावलपिंडी वालों की दुकान’ है।
शहर के गांधी चौक पर कभी ‘लायलपुर क्लॉथ’ नाम से कपड़े की दुकान संचालित होती थी। यह नाम कारोबार से ज्यादा उस शहर की याद था, जहां से परिवार की पिछली पीढ़ी यहां पहुंची थी। विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आए बर्तन व्यवसायी सतीश धवन कहते हैं कि ‘लायलपुर की यादें आज भी दिल में जिंदा हैं।’ उनके अनुसार, परिवार की पिछली पीढ़ी ने विभाजन के दौरान जो दर्द और संघर्ष देखा, उसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है।
नामों में बची हैं जड़ों की कहानियां
श्रीगंगानगर के बाजारों में लगे ये नाम 1947 के उस दौर की याद दिलाते हैं, जब लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़कर अनजान जगहों पर नई जिंदगी शुरू करनी पड़ी थी। किसी ने दुकान के नाम में अपना शहर बचा लिया तो किसी ने कारोबार, बोली, खान-पान और परंपराओं में अपनी पुरानी पहचान को आगे बढ़ाया।
Updated on:
15 Aug 2026 06:00 am
Published on:
15 Aug 2026 06:00 am
