
युवक अब बच्चों को दे रहा शिक्षा (photo source- Patrika)
Naxal Area Development: नक्सल प्रभावित बस्तर में बदलाव की एक प्रेरक तस्वीर सामने आई है। कोंटा विकासखंड के दूरस्थ गांव पुवर्ती के ओयापारा में, जहां कभी बंदूक की गूंज और डर का साया था, अब बच्चों की पढ़ाई की आवाज सुनाई दे रही है। इस बदलाव की कहानी है बारसे बुधरा की, जो कभी जनताना स्कूल में पढ़ा और आज उसी इलाके में ‘शिक्षादूत’ बनकर बच्चों को शिक्षा की राह दिखा रहा है।
बारसे बुधरा, माओवादी बटालियन कमांडर रहे बारसे देवा का छोटा भाई है। जिस परिवार पर कभी नक्सल प्रभाव की छाया थी, आज वही परिवार मुख्यधारा में लौटकर समाज में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है। बुधरा की यह यात्रा राज्य सरकार की पुनर्वास नीति ‘पूना मार्गेम’ की सफलता का जीवंत उदाहरण मानी जा रही है। अक्टूबर माह में सुकमा कलेक्टर अमित कुमार ने बुधरा को सिलगेर प्राथमिक शाला में शिक्षादूत के रूप में पदस्थ किया। करीब 13 हजार रुपए मासिक मानदेय के साथ उसे नई पहचान मिली है। अब वह गांव के बच्चों को पढ़ाकर उनके भविष्य को संवारने में जुटा है।
बुधरा का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उसने जनताना स्कूल में पढ़ाई की, जहां एक ओर माओवादी गतिविधियों का प्रभाव था, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा बलों का दबाव। पढ़ाई के दौरान कई बार उसे पुलिस पूछताछ का सामना करना पड़ा, तो कई बार नक्सलियों के शक की वजह से मानसिक तनाव झेलना पड़ा। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने पढ़ाई जारी रखी और आज वही युवक बच्चों के हाथों में किताबें देकर उन्हें डर नहीं, बल्कि सपने देखना सिखा रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी सुकमा प्रवास के दौरान बारसे बुधरा को उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया। यह सम्मान न सिर्फ बुधरा के लिए, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए एक संदेश है, जो मुख्यधारा में लौटकर नई शुरुआत करना चाहते हैं।
आज बस्तर में विकास की राह सिर्फ सडक़ों और योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन ङ्क्षजदगियों तक पहुंच रही है, जहां कभी डर और असुरक्षा हावी थी। बारसे बुधरा जैसे युवाओं की कहानियां इस बदलाव की गवाही दे रही हैं—जहां बंदूक के साए से निकलकर अब शिक्षा की रोशनी फैल रही है।
Updated on:
24 Apr 2026 01:33 pm
Published on:
24 Apr 2026 01:33 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
